इस ब्लॉग पर पोस्ट की गयी तस्वीरों (Photographs) पर क्लिक कर के आप उन्हें और स्पष्ट देख सकते हैं।

Sunday, 27 November 2011

Searching my self....
here and there..
walking around the world...
through the net;
through the google...
......can't find myself :(
where i am?
शब्द!
न जाने क्यों
इतना बिखरे बिखरे से लग रहे हैं
शायद इंतज़ार कर रहे हैं
मेरे भी बिखरने का
ये बिखरे बिखरे से
शब्द!
 
(कभी इसे फेसबुक स्टेटस मे लिखा था)

बात बन गयी



सोचना है कुछ
कुछ लिखना है
करनी है ईमेल
और जल्दी से भेजना है
संपादक को छापने की जल्दी है
और मुझे छपने की
अपना नाम देखने की
जल्दी है ,बहुत जल्दी है
सच मे क्या करूँ
लाइनें लिखता हूँ
मिटाता हूँ
बार बार दोहराता हूँ
और डालता  हूँ
आस पास एक नज़र
कोई विषय मिल जाए
तो बात बन जाए
दोनों की 
छपने वाले की भी
छापने वाले की भी
और बनती जा रही हैं
यह पंक्तियाँ
जो आप पढ़ रहे हैं
अपना सिर पकड़ के

भौहों को तान के
झेल रहे हैं
यह हल्की फुलकी नज़्म (?)
कविता (?)
या कुछ और
जो भी हो
मेरी तो बात बन गयी
पर  आपकी ?  :)

(www.nazariya.in पर पूर्व प्रकाशित )

चैट

बात करने का एक तरीका होता है चाहे वह बात फोन पर हो या चैट पर ,किसी बड़े से हो या छोटे से,या बराबर वाले से। बात शुरू हाय,हैलो या नमस्ते से होती है तो खत्म भी कम से कम बाय से ही होती है। खासतौर से ऑनलाइन चैट शुरू हो जाने के बाद अगर एक तरफ से किसी का जवाब नहीं आता तो दूसरे को उलझन होना स्वाभाविक है। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि बात को सही तरह से समाप्त कर दिया जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है या होता भी है तो  कभी कभी और बहुत कम होता है। नतीजा चैट लिस्ट से बाहर हो जाने के रूप मे सामने आता है।

कुछ ऐसे ही दोस्तों की संगत मुझे भी प्राप्त हो गयी है जो बात करते करते अचानक गायब हो जाते हैं या बात को लटकाकर चले जाते हैं उसके बाद भी उनको अपेक्षा  रहती है कि उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए। कुछ लोगों को तो मैंने उनके आचरण की वजह से चैट लिस्ट से बाहर भी कर रखा है। हालांकि इससे कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि मैं खुद अब बहुत कम ही ऑनलाइन नज़र आता हूँ।  

Saturday, 26 November 2011

घने अंधेरे में
चलते चलते
अचानक
एक हल्की सी रोशनी
आ गयी मेरा साथ निभाने
और मेरी परछाई
कोशिश करने लगी
मुझ से बातें करने की
न चाह कर भी
मैं मुंह न मोड़ सका
उससे
सारे रास्ते
मुझे झेलना ही पड़ा
अपने ही अक्स को।

Friday, 25 November 2011

Out of date…

Like to listen old classics
Like to live in a simple way
Not a liquor
Smoker
haven't the qualities
of the modern day
My friends says-
am out of date
and proudly
i accept the words
yes….am out of date
coz…outdated things;
are more valuable
than the newer once
proud to be an old
and old is always gold :))))

Please do not ignore grammatical mistakes and help me to improve my English.
हैं नहीं कुछ भी पर खुद को खुदा समझते हैं वो,
मजबूर आदत पर वश उनका चलता नहीं है
कितनी बार समझाया कि बदल जाओ ए दोस्त
घड़े हैं इतने चिकने कि असर कुछ होता नहीं है।

Thursday, 24 November 2011

फेसबुकियों के हित में जारी---

फेसबुक पर आजकल एकाउंट  हैक होने का बड़ा हल्ला मचा हुआ है। अगर आप भी फेसबुक पर हैं तो एक छोटा सा काम कीजिये--
Account Settings में जाइये --वहाँ Security पर क्लिक कीजिये और  Secure browsing को Enable कर के सेव कर लीजिये।
अब एक चीज़ ध्यान से देखिएगा  आपके ब्राउज़र की विंडो मे  फेसबुक एड्रेस की शुरुआत में http:// की जगह https:// लिखा आ रहा होगा। इसका मतलब कि आपका एकाउंट अब काफी हद तक सुरक्षित है।
वैसे यह कोई स्थायी समाधान नहीं है फिर भी कुछ तो मदद मिलेगी ही ।
और हाँ प्लीज़ (खास तौर से महिलाएं) अपनी व्यक्तिगत तसवीरों पर प्राइवेसी लगा कर रखें यानि अपनी फोटोस को बहुत ही चुने हुए ,विश्वस्त और खास फेसबुक मित्रों के साथ ही साझा करें।


यह पोस्ट फेसबुकियों के हित में जारी!

Tuesday, 22 November 2011

अभिभूत हूँ ...........

यूं तो हमेशा से ही मेरा जन्मदिन सादगी से मनाया जाता रहा है और कल  भी उसी सादगी से मनाया गया और आने वाले वर्षों मे भी यह सादगी कायम रहेगी।हर साल की तरह पापा-मम्मी ने कल भी हवन किया और कुछ आहुतियाँ मैंने भी डालीं। वैसे भी हवन विशुद्ध भारतीय और वैदिक पद्धति का ज़रूरी हिस्सा है  जिससे न केवल आसपास का वायुमंडल स्वच्छ होता है बल्कि आत्मिक शांति भी मिलती है। खैर अगर इस विषय पर कुछ बोलूँ प्रवचन जैसा हो जाएगा और आप लोग पक जाओगे इसलिए यह बात बस इतनी ही।

हाँ तो मैं यह कह रहा था कि मुझे इस बात का एहसास तो था कि अच्छी ख़ासी शुभकामनाएँ मिलने वाली हैं ब्लॉग पर भी और फेसबुक पर भी और जिस तरह से 20 तारीख से ही एस एम एस -फोन और फेसबुक का सिलसिला एडवांस मे चला यह विश्वास पक्का था।

लेकिन मैं सपने में  भी नहीं सोच सकता था कि कोई मुझ पर कविता लिख देगा लेकिन यह सपना नहीं अब तो हकीकत है और आपके सामने है नीचे की तस्वीर देखिये--


और वो 'कोई' कोई और नहीं आदरणीय अरुण निगम जी हैं जिन्होने दो दिन पहले ही 22 तारीख को शब्दों की मिठाई खाने का ज़िक्र मेरी फेसबुक वॉल पर किया था लेकिन तब मैं उनका मतलब नहीं समझ पाया था।यह कविता उन्होने मुझे मेल पर भेजी है।  मैं किन शब्दों मे उनको धन्यवाद कहूँ समझ नहीं पा रहा हूँ लेकिन उनका यह स्नेह अभिभूत कर देने वाला है।

एक और सरप्राइज़ गूगल बाबा ने भी दे दिया पता नहीं जाने अनजाने या कुछ और बात हो। कोई चीज़ सर्च करने जब गूगल खोला तो यह नज़ारा था---


इसमें गूगल के टाइटिल पर नज़र डालिये। इसी साइट को जब पापा की आई डी से खोला तो 'गूगल' अपने स्टेंडर्ड रूप मे ही लिखा मिला।

बहुत लोगों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि 'ऐसा तो होता रहता है'।  पर मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है।

हाँ एक दो लोगों ने मुझ से केक खाने को कहा मुझे केक पसंद भी है लेकिन पापा -मम्मी को नहीं पसंद वैसे भी इस मौके पर अकेले खाना मुझे अच्छा नहीं लगेगा तो प्लीज़ इस बार  के लिए सॉरी पर कभी मौका मिलेगा तो ज़रूर सबके साथ केक का भी स्वाद लिया जाएगा।

और हाँ देर से ही सही पर चलते चलते वर्चुअल मिठाई का स्वाद आप भी ले लीजिये---


 एक बार पुनः आप सभी की शुभकमानाओं-आशीर्वाद और स्नेह के लिये तहे  दिल से शुक्रिया। इसे आगे भी बनाए रखिएगा।

Monday, 21 November 2011

कुछ बातें अधूरी ही रहती हैं
कुछ सपने अधूरे ही रहते हैं
क्योंकि उन्हें
कभी पूरा नहीं होना होता।

Saturday, 19 November 2011

नाराज़ न हो

नाराज़ न हो इस तरह कि
अश्क भी इन्कार कर दें आँखों से झरने को..
.नाराज़ न हो इस तरह कि 
जिस्म भी तडफड़ाए रूह से मिलने को....
नाराज़ न हो इस तरह कि 
बसंत मे पतझड़ बनकर
मैं कहीं बिखर जाऊँ सूखे पत्तों की तरह..... 
नाराज़ न हो इस तरह कि 
तेरी यादों से परे हो जाऊँ 
और तू मुझे ढूँढे किसी कस्तूरी की तरह....
नाराज़ न हो कि 
तुझमे मैं अपना अक्स देख कर 
अक्सर यह सोचता हूँ कि 
है तू बिलकुल मेरी ही तरह ....

(यशवन्त माथुर)

Friday, 18 November 2011

चल रहा है जो जैसे
वैसे चलता रहेगा
अपनी गति से
न मेरे चाहने से
न किसी और के चाहने से
न कहने से
न सुनने से
बस एक साज है
और उसकी
एक ही धुन है
चलते जाना है
आँख पर पट्टी बांधे !

रंग दिखाने लगी है
अब तो ये आवारा ठंड
कुछ समय तम्बू तान कर
डालेगी डेरा
होके बे खबर
कि क्या गुज़रेगी
सड़कों के किनारों पर।

धन्यवाद

आश्चर्यजनक रूप से इस ब्लॉग को आप लोग और कुछ छुपे हुए लोग पसंद कर रहे हैं। पता नहीं आपने क्या देखा मेरी इन बातों में । पहले सोचा था इसे प्राइवेट ब्लॉग ही बना दूँ फिर जाने क्या मन में आया कि इसे ओपन ही रहने दिया। मुझे लग रहा था कि जहां  150 से ज़्यादा फॉलोअर्स वाला ब्लॉग है वहाँ इन छोटी मोटी बेकार बातों को मेरे अलावा और कौन पसंद करेगा। भई मैं तो पसंद करूंगा ही अपनी बातों को क्योंकि मुझे तो पसंद हैं अपनी बातें।

खैर जो भी हो अब ब्लॉग है तो बेचारा चलेगा ही और नहीं चलेगा तो मैं तो इसे चलाऊँगा ही बनाया जो है।

वैसे सच कहूँ मुझे अच्छा लगता है जब कोई मेरी बातों को अपना समझ कर पसंद करता है। हाँ एक इंसान है (नाम नहीं पूछना) जिसे यह बातें अपनी सी लगती हैं। चलो कोई तो है। 

और हाँ धन्यवाद कह रहा हूँ आप सब को इस ब्लॉग को पसंद करने के लिये  :)

Thursday, 17 November 2011

रचना ,कल्पना और वास्तविकता

रचनाकार जो लिखता है वास्तविकता से प्रेरित हो कर लिखता है लेकिन कहीं न कहीं कल्पना का सहारा भी लेता है।हालांकि कल्पना अधिकांशतः कविताओं मे ज़्यादा प्रतिशत के रूप मे पाई जाती है फिर भी कल्पना का एक हिस्सा कहानी और आलेखों मे भी नज़र आ जाता है।

अच्छा लगता है जब किसी रचना को पढ़कर कोई पाठक एक अपनापन सा महसूस करने लगता है और वो मेल पर आपकी तारीफ़ों के हवाई पुल  बांधने लगता है,लेकिन जैसे ही इस कल्पना से परे धरातल पर आने का अहसास होता है सारा अपनापन धरा का धरा रह जाता है और अवशेष रूप मे रह जाते हैं तो सिर्फ टूट कर बिखरे हुए कुछ जज़्बात।  वो जज़्बात जो किसी के लिए तो अनमोल होते हैं पर किसी एक के लिए खिलौने से कम नहीं होते। शायद कुछ लोगों की आदत ही ऐसी होती है।  

Wednesday, 16 November 2011

मेरा इंतज़ार


जंगली धूप और
मरघटी रातों मे
अनजान गलियों की ,
सुनसान  सड़कों पर
अकेले चलते हुए
मैंने देखा -
हर मोड़ पर कर रहे थे
मेरा इंतज़ार
वक़्त के अदृश्य
पहरेदार!

http://jomeramankahe.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html

Tuesday, 15 November 2011

बीती बातों का खंजर लिये
न जाने क्यों
बे रहम हो चला है वक़्त !

--यशवन्त
मुझे नहीं मालूम मेरा मुकाम क्या है ....
बस धूल के साथ उड़कर .....
हवा मे बिखर जाना चाहता हूँ .....
और खो जाना चाहता हूँ कहीं.....
हमेशा के लिये !

Its The Time To Move

Its the time to move;
to decide a plan for a journey of life,
no ray is going on a positive way,
nothing to say;
how can survive or;
how can be alive;
without a thought,
no,not,never,whatever will be done;
after death,
lets move! move for a new journey!!
with no willing;
without compromise,
Its the time to move;
to decide a plan for a journey of life.


(http://jomeramankahe.blogspot.com/2010/06/its-time-to-moov.html)
There is Nothing
except Everything

there is everything
except nothing

am confused!
I know
i saw
i belive
u r 'in a relationship'
with someone else

a bright future
is waiting for u

God Bless!

Monday, 14 November 2011

बाल दिवस की बकवास

आज है  14 नवंबर यानि बाल दिवस।  बहुत हल्ला है ...बाल दिवस का ...स्कूलों मे बच्चों से इसके लिए अलग से चंदा मांगा गया होगा और उसी चंदे से उन बच्चों को लड्डू मिठाई या आधुनिक युग की बात करें तो चॉकलेट बाँट दी गयी होगी। मुझे अच्छी तरह से याद है मेरे स्कूल मे एक केले के ठेल वाले को बुला लिया जाता था और फिर केले बांटे जाते थे। हाँ तब 2-5 रु, इसके नाम से ले भी लिए जाते थे। खैर बात आज की कर रहा हूँ तमाम तरकारी उर्फ सरकारी कार्यक्रम अब तक हो चुके होंगे,बाल कल्याण के खूब ढ़ोल पिटे होंगे अब आप कहोगे ये सरकारी को तरकारी लिखने का मतलब क्या है....मतलब साफ है  .....तरकारी को जैसे काटा छीला जाता है और खराब निकलने पर फेंक दिया जाता है ऐसे ही सरकारी कार्यक्रम भी हैं बस बातों को काटते हैं,छीलते हैं और  फेंक देते हैं ...हवा मे उड़ा देते हैं।

आज भी एक तरफ ए सी बसों मे बच्चों  को सजधज कर स्कूल जाते देखा और घर के सामने बन रहे मकान मे दो तीन मजदूरों के बच्चों को रेत मे खेलते भी देखा और हाँ जब अपनी साइकिल ठीक कराने गया तो एक बच्चे को पंचर बनाते भी देखा।

कुछ प्रश्न मन में लहर की तरह हिलोरें ले रहे हैं-

क्या बाल दिवस सिर्फ अमीरों के ही बच्चों का होता है?
क्या किसी गरीब का बच्चा एक दिन घर का चूल्हा जलने की फिक्र न करके मौज मस्ती की दुनिया मे खो सकता है?

मैं जानता हूँ इस सवाल के बहुत से आदर्श जवाब होंगे जो टिप्पणी मे मुझे संभवतः मिल भी जाएंगे लेकिन क्या मैं और आप सच मे अपने अन्तर्मन मे झांक सकते हैं?
अब सामने आना बंद कर दिया उसने कि कहीं....
नज़र मेरी उसे लग न जाए
और फिर वो सोचे
क़ुसूर किसका है ....
उसका या मेरा ?

Sunday, 13 November 2011

बेचैन शामों मे
डूबते सूरज की मंद रोशनी मे
डर  जाता हूँ अक्सर
अपना अक्स देख कर!

किसी नासमझ के लिये ....

पता नहीं...
तुम्हारा साथ कितना है....
शायद एक दिन...
तुम भी 
किसी और का हाथ थाम कर 
चले जाओगे ....
और मैं .....
खामोशी से.....
गिरते आंसुओं को पीता रहूँगा...
तुम्हारी सलामती की दुआ के साथ!

Saturday, 12 November 2011

न जाने क्यों
ये वक़्त इतनी तेज़ चल रहा है
आखिर क्यों
इस वक़्त के पास
थोड़ा भी रुकने की फुर्सत नहीं....

बहुत अजीब होता है यह वक़्त भी!
सबके जीवन मे एक मोड ऐसा भी आता है जब एक साथ की ज़रूरत होती है ,जब महसूस होता है कि कोई पास बैठे और हमे सुने ,और अगर किस्मत अच्छी रही तो सुनने वाले बहुत मिल जाते हैं ,लेकिन ऐसी अच्छी किस्मत भी कहाँ जब सुनने और समझने वाला एक भी इंसान मिल जाए;हज़ार या लाख मे एक को ही ऐसी किस्मत नसीब होती होगी। 

Friday, 11 November 2011

 इसे कभी फेसबुकपर नोट्स मे लिखा था। 

ले चुका मैं
अंतिम सांस
तड़प तड़प कर
तेरा नाम ले ले कर
इक उम्मीद थी
तुम्हारे आने की
पर मैं कब तक खुद को
संभाल कर रखता
अब तुम आओ
या ना आओ
कोई फर्क नहीं
क्योंकि  मैं
अब एक लाश के सिवा
और कुछ भी नहीं।

गुज़रा कल

कभी आज हुआ करता था
और अब बीता कल बन के
न जाने कब का गुज़र चुका हूँ
फिर भी न जाने क्या
मिल जाता है लोगों को
कि बीते फसानों में दिल जलाने को
अब भी मेरी बातें किया करते हैं।

Thursday, 10 November 2011

जहां कोई सुनने को तैयार न हो वहाँ भैंस के आगे बीन बजाने का कोई फायदा नहीं है। इससे तो एकला चलो रे ज़्यादा अच्छा है कम से कम इस तरह खुद को तसल्ली तो दे ही सकते हैं  और कुछ हो या न हो।

Wednesday, 9 November 2011

Who says Love is beautiful?
am completely disagree; coz Love always hurts.
if u fall in love, u should always be ready to bear the pain in your heart,soul and mind.


कुछ लोगों के लिए जज़्बातों की कोई कीमत नहीं होती ऐसे लोग दूसरे के जज़्बातों से खेलकर मज़े लेते हैं लेकिन ये नहीं जानते कि कभी उनके साथ भी ऐसा ही हो सकता है। वक़्त आज उनके साथ है ,रहने दीजिये,खुद को तसल्ली देना और खुद का साथ देने मे ही समझदारी है क्योंकि खुद से अच्छा खुद का कोई दोस्त नहीं होता।

यह मन भी ना

ये मन बहुत अजीब होता है जब सोचता है तो किसी एक को इतना सोचता है कि बस और जब वो नज़रों से उतर जाए चाहे किसी भी वजह से तो उसके हर एहसास से नफरत सी होने लगती है ;फिर भी वह एहसास रह रह कर काटने को दौड़ते हैं और यह मन हमे छोड़ देता है बेहिसाब तड़पते रहने के लिए।

Tuesday, 8 November 2011

पता नहीं क्यों लोग गधे को गधा कहते हैं जबकि गधा सहनशीलता को समर्पित एक सामाजिक प्राणी है। ये बात और है कि कभी कभी वो दुलत्ती मार कर अपनी संवेदनशीलता का एहसास भी करा देता है।

Monday, 7 November 2011

पुनर्जीवन

एक ख्वाब कल रात को देखा .....अनजाने भंवर मे ......मैं घिरता जा रहा था .....फँसता जा रहा था .....निहायत ही अकेला .....और निर्वात का ......एक अजीब सा अनुभव.......जहां मेरी चीख़ों और दर्द को ........कोई सुनने वाला ही नहीं था.......कि  तभी महसूस हुआ पीठ पर एक हाथ .....कौन था वो नहीं पता पर खीच लाया.....उस भयंकर निर्वात से मुझको .....और मैं जी रहा हूँ पुनर्जीवन .....उसी की बदौलत। 

शशि शेखर


बहुत बचपन मे (7-8 साल की उम्र मे ) हमारे घर 'आज' अखबार आया करता था। संपादकीय पढ़कर पापा अक्सर कहते आज शशि शेखर ने ये लिखा वो लिखा (तब वह आगरा संस्करण के स्थानीय संपादक थे 90 के दशक मे) ;मेरी समझ मे तब ये बातें नहीं आती थीं बस इतना समझ गया था कि शशि शेखर अखबार मे लिखते हैं। पर आज जब वह 'हिंदुस्तान' के प्रधान संपादक हैं हर रविवार उनके आलेख को मैं  ज़रूर पढ़ता हूँ। हो सकता है कुछ लोगों का उनकी बात से मत वैभिन्नय हो पर उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी बात यह है कि सड़क पर रिक्शा चलाने वाला और झूग्गी मे रहने वाला थोड़ा भी पढ़ा लिखा आदमी उनकी बात आसानी से समझ सकता है।
एक अच्छी लेखन की शैली की यही तो विशेषता है कि वो आम पाठक को बांधे रखे और बात उसको समझ मे आने वाली हो। इस दृष्टि से शशि शेखर मेरे सबसे पसंदीदा स्तंभकार हैं।

Sunday, 6 November 2011

चाहत सिर्फ चाहत होती है। ज़रूरी नहीं कि आप जिसे चाहें वो आपको भी चाहे,उतना ही चाहे जितना आप चाहते हैं। चाहत अनमोल है पर कुछ लोग बेदर्दी से इस चाहत का कत्ल कर देते हैं। 

Saturday, 5 November 2011

जीवन का एक सच........

किसी बहुत ही अज़ीज़ ने कभी यह एस एम एस भेजा था--

"जीवन का एक सच -
सच्चा प्यार हमेशा गलत इंसान से होता है 
और जब सही इंसान से होता है तब गलत वक़्त पर  होता है। "

पता नहीं आपकी नज़रों मे यह सच है या नहीं पर मुझे सच लगता है।

Friday, 4 November 2011

वो

किसी ने दरवाजा
ज़ोर से खटकाया
मैंने खोला
और उसे देखा
तो देखता ही रह गया
वो मुस्कुरा रही थी
किसी बिछड़े दोस्त की तरह
इस शहर मे
मेरे होने की खबर पाते ही
वो दौड़ती हुई आई थी
वो
वो
अरे हाँ वो
वो
जो मेरी मौत थी।

बातें खुद से .......

कुछ अधूरे से शब्द
कुछ अधूरी सी बातें
जो अक्सर अधूरी 
ही रह जाती हैं
बस कुछ शब्द-
कहूँगा यहाँ
और करूंगा
कुछ बातें खुद से!