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Sunday, 13 November 2011

किसी नासमझ के लिये ....

पता नहीं...
तुम्हारा साथ कितना है....
शायद एक दिन...
तुम भी 
किसी और का हाथ थाम कर 
चले जाओगे ....
और मैं .....
खामोशी से.....
गिरते आंसुओं को पीता रहूँगा...
तुम्हारी सलामती की दुआ के साथ!

2 comments:

  1. “हर लम्हा यूँ साथ छुडा जाता है
    सबका मुझसे दो पल का नाता है”

    बढ़िया रचना....
    सादर...

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