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Thursday, 17 November 2011

रचना ,कल्पना और वास्तविकता

रचनाकार जो लिखता है वास्तविकता से प्रेरित हो कर लिखता है लेकिन कहीं न कहीं कल्पना का सहारा भी लेता है।हालांकि कल्पना अधिकांशतः कविताओं मे ज़्यादा प्रतिशत के रूप मे पाई जाती है फिर भी कल्पना का एक हिस्सा कहानी और आलेखों मे भी नज़र आ जाता है।

अच्छा लगता है जब किसी रचना को पढ़कर कोई पाठक एक अपनापन सा महसूस करने लगता है और वो मेल पर आपकी तारीफ़ों के हवाई पुल  बांधने लगता है,लेकिन जैसे ही इस कल्पना से परे धरातल पर आने का अहसास होता है सारा अपनापन धरा का धरा रह जाता है और अवशेष रूप मे रह जाते हैं तो सिर्फ टूट कर बिखरे हुए कुछ जज़्बात।  वो जज़्बात जो किसी के लिए तो अनमोल होते हैं पर किसी एक के लिए खिलौने से कम नहीं होते। शायद कुछ लोगों की आदत ही ऐसी होती है।  

1 comment:

  1. क्या बात ..है बहत खूब ..बिलकुल सत्य लिखा है आपने
    जहाँ तक जज्बातों के टूटने ,बिखरने की बात है तो ये जहर
    यहाँ लगभग सभी ने पिया है .....धन्यबाद

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