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Saturday, 19 November 2011

नाराज़ न हो

नाराज़ न हो इस तरह कि
अश्क भी इन्कार कर दें आँखों से झरने को..
.नाराज़ न हो इस तरह कि 
जिस्म भी तडफड़ाए रूह से मिलने को....
नाराज़ न हो इस तरह कि 
बसंत मे पतझड़ बनकर
मैं कहीं बिखर जाऊँ सूखे पत्तों की तरह..... 
नाराज़ न हो इस तरह कि 
तेरी यादों से परे हो जाऊँ 
और तू मुझे ढूँढे किसी कस्तूरी की तरह....
नाराज़ न हो कि 
तुझमे मैं अपना अक्स देख कर 
अक्सर यह सोचता हूँ कि 
है तू बिलकुल मेरी ही तरह ....

(यशवन्त माथुर)

8 comments:

  1. बेहतरीन अभिवयक्ति......

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  2. बेहद सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  3. नाराज़ न हो इस तरह कि
    अश्क भी इन्कार कर दें आँखों से झरने को........वाह
    बहुत खूब यशवन्त भाई.........
    ..सरल शब्दों का भावात्मक प्रयोग.....
    मुझे भी सिखाइये ना
    यशोदा

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  4. नाराजगी से नाराज न हो , अच्छी रचनाओं का सृजन यही तो कराती है.बहुत सुंदर.....

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  5. वो आपमें है और आप उसमें। फिर नाराज़गी की वजह?

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  6. खुबशुरत नारजगी से भरी बेहतरीन रचना सुंदर पोस्ट...बधाई
    मेरे नए पोस्ट पर स्वागत है ....

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  7. अपने भावो को खूबसूरती से व्यक्त करती सुन्दर रचना |

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