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Friday, 11 November 2011

 इसे कभी फेसबुकपर नोट्स मे लिखा था। 

ले चुका मैं
अंतिम सांस
तड़प तड़प कर
तेरा नाम ले ले कर
इक उम्मीद थी
तुम्हारे आने की
पर मैं कब तक खुद को
संभाल कर रखता
अब तुम आओ
या ना आओ
कोई फर्क नहीं
क्योंकि  मैं
अब एक लाश के सिवा
और कुछ भी नहीं।

2 comments:

  1. टूटते हर्दय की व्यथा....बहुत ही मार्मिक...

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