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Friday, 16 December 2011

पत्थर !

बन जाना चाहता हूँ एक पत्थर
जिस पर कोई असर नहीं होता
न खुशी का ,न गम का
जिसमे नहीं होती भावनाएँ
बस कुछ  आड़ी तिरछी लकीरों को
अपने साथ लिये
छैनी हथोड़े की चोटें खा खा कर
लहरों से टकरा टकरा कर
टुकड़े टुकड़े होता है
दीवारों मे चुनता है
पर अस्तित्व
कभी नहीं खोता है
पत्थर !

18 comments:

  1. ....तभी तो पत्थर को यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह प्रभु की मूर्ति में ढ़लकर युगों युगों तक श्रद्धा का केंद्र बना रहता है...!

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  2. निर्विकार पत्थर होना ज्यादा बेहतर लगता है अब तो..
    न भावनाएं, न संवेदनाएं,न सुख, न दुःख,न उपकार, न प्रतिकार....!!
    शायद इसीलिए पत्थर को पूजा जाता है...!!

    सुन्दर भावपूर्ण....

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  4. सच में आज भावनाएं रही कहाँ हैं...आदमी पत्थर बन कर ही तो रह गया है...भावपूर्ण प्रस्तुति..

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  5. अस्तित्व किसी का नहीं खोता , बस जानना है- हारना नहीं

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  6. छैनी हथोड़े की चोटें खा खा कर पत्थ्रर भी रोता चिल्लाता हो्गा पर सुनने वाला कोई नही...वो जानता है इसी लिये अडीग स्थिर और मौन होगया ..बहुत सुन्दर भावमयी रचना...

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  7. gambheerta,sahansheelta,majboot iraade agar patthar ki tarah ho to kya kahne...

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  8. आस्था पत्थर को देवता बना देती है।

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  9. छैनी हथोड़े की चोटें खा खा कर......खूबसूरत मूर्ति भी बन सकती है ...जिजीविषा पूर्ण रचना

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  10. बन जाना चाहता हूँ एक पत्थर
    जिस पर कोई असर नहीं होता
    न खुशी का ,न गम का
    जिसमे नहीं होती भावनाएँ

    पर अस्तित्व कभी नहीं खोता है....!
    कभी खोना भी नहीं ,इतने समझदार को क्या समझाना.... !!

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  11. नमस्कार मित्र आईये बात करें कुछ बदलते रिश्तों की आज कीनई पुरानी हलचल पर इंतजार है आपके आने का
    सादर
    सुनीता शानू

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  12. उत्तम रचना के लिए बधाई |
    आशा

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  13. सच है.... अनेक अवसर आते हैं जब पत्थर ही हो जाने का मन होता है....
    सार्थक रचना... सादर..

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  14. paththar bankar rahne vale hi is dunia mein jee sakte hai...bahut hi achchi rachna..aabhar

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  15. वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

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  16. sacchi bat
    ati uttam rachana hai...

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