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Sunday, 25 December 2011

दीवार पर लगी तस्वीर  में एक चेहरा खाली है
उसे इंतज़ार है बेसब्री से मेरे चेहरे का
और मुझे भी इंतज़ार है दीवार पर टंगने का
किसी की नज़र तो अपना समझ कर देखेगी मुझ को
और फिर कह देगी नज़रों से नज़रों की बातों को
ये बात और है कि सुनने के लिए मैं न होउंगा ज़मीन पर
हिलती तस्वीर ही कह देगी मेरी बात हवा के झोंकों पर
महसूस करना न करना उसकी मर्ज़ी है
बेज़बानों को इतना तो दर्द होता ही है

----यशवन्त माथुर


5 comments:

  1. bahut hi dard bahre gahare bhavo se likhi abhivyakti hai....
    itana dard kyu....

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  2. सुन्दर प्रस्तुति.
    लगता है ये नया ब्लॉग बनाया है आपने,यशवंत जी.

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  3. गहन भावों का समावेश ।

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  4. गहन अभिवयक्ति........

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