इस ब्लॉग पर पोस्ट की गयी तस्वीरों (Photographs) पर क्लिक कर के आप उन्हें और स्पष्ट देख सकते हैं।

Wednesday, 29 August 2012

आज का फेसबुक स्टेटस

तेज़ बारिश मे सड़क किनारे अब पत्तों की छत नहीं,
कड़ी धूप मे ढूँढता छाया,अफसोस !अब कोई दरख्त नहीं :(

~यशवन्त माथुर~

Tuesday, 24 July 2012

कहने को कुछ बातें हैं,कुछ शब्द हैं और मन में हलचल है ,तुम समझती सब हो पर समझ कर भी अनजान बनी रहती हो ,शायद मैं ही कुछ कह दूँ ...कभी...किसी दिन....पर इतना याद रखना ,मेरी ये खामोशी भी ....है तो सिर्फ.....तुम्हारे लिये।

Tuesday, 20 March 2012

तुकबंदी

बढ़ा किराया महंगी रेल ,
खर्चों पर है नहीं नकेल ,
सरकार पास और जनता फेल,
टूटी कमर निकला तेल। 

Friday, 16 March 2012

आज का फेसबुक स्टेटस ......

मैं सोच रहा था आज वित्त मंत्री महोदय से शराब और सिगरेट के दाम बे इंतिहा बढ़ाने की रिक्वेस्ट करूँ इतने ज़्यादा कि इन चीजों के दाम सुनकर ही लोगों के उड़ जाएँ पर अफसोस इससे पहले कि मैं रिक्वेस्ट करता सचिन बाबू ने महाशतक जड़ दिया और शायद वित्त मंत्री जी अब शतक सेलिब्रेशन मे बिज़ी हो गए होंगे। अब उनके पास तो क्या किसी के भी पास मेरी बकवास सुनने की फुरसत नहीं होगी। :((

बट एनी वे कोंग्रेट्स तो मिस्टर तेंदुलकर !सुना है अब कोई उन से सन्यास लेने को कहने की हिम्मत भी नहीं करेगा :))

Wednesday, 14 March 2012

6 साल का बच्चा शायद इतना ही लिख सकता है ---

मुझे अभी तक यही याद था कि मैंने अपनी पहली कविता 8 वर्ष की उम्र मे लिखी थी लेकिन आज जब पापा ने 28 अप्रेल 1990 का आगरा  से प्रकाशित 'सप्तदिवा'  (साप्ताहिक) अपनी किसी फाइल मे से ढूंढ कर निकाला तो उस तारीख के हिसाब से मेरी उम्र 6 वर्ष की रही होगी (जन्म तिथि 22 नवंबर 1983)। हालांकि संपादक महोदय ने अपनी टिप्पणी मे  एक 7 वर्षीय बालक लिखा है। आज जब खुद की यह कविता पढ़ी तो बहुत हंसी आयी --

बड़ा देखने के लिए इमेज पर क्लिक करें 

ऊपर वाली इमेज मे से ही काट कर यह बनी है बड़ा देखने के लिए इमेज पर क्लिक करें 

Tuesday, 13 March 2012

बीता हुआ कल हूँ (Audio Vesion)

जो मेरा मन कहे पर प्रकाशित कविता "बीता हुआ कल हूँ " पर एक टिप्पणी इन्दु सिंह जी ने की थी--

sunder-sunder abhiyakti....
aapki aawaz me bhi sunna chahenge..............."

उनकी इस टिप्पणी का सम्मान करते हुए मैंने यह कविता आज रिकॉर्ड कर दी है --



 डाउन्लोड लिंक यह है--http://www.divshare.com/download/17022226-ebd

(संभव है कि आपके सिस्टम पर यह ऑडियो रुक रुक कर चले यह आपके इन्टरनेट कनेकशन की स्पीड पर निर्भर होगा)

मेरे पास बहुत ही सस्ता वाला हेडफोन है जो सिस्टम के साथ मुफ्त मे मिला था इसलिए मेरी रिकोर्ड़िंग्स की  वोयस क्वालिटी खराब ही रहती है  :( फिर भी एक कोशिश की है। 

Monday, 12 March 2012

अपनेपन को क्या शब्द दूँ ?

होली के 15 दिन पहले से तबीयत खराब होने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह रुक रुक कर अभी जारी है। हांलांकी पहले से काफी सुधार है फिर भी औरों की तरह सूती कपड़े पहन कर मैं गर्मी नहीं मना पा रहा हूँ। :( बिना बाहों का एक स्वेटर और ऊपर से जेकेट ,पैरों मे मोजे ....मुझे गर्मी का एहसास तक नहीं हो रहा है।
वैसे इस तबीयत के खराब होने कई कारण हैं शरीर का पतला पापड़ होना (सींकिया कहना ज़्यादा सही होगा शायद ),रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना,जन्म से ही लिवर प्रोब्लम्स का होना ,छोटी छोटी बातों से तनाव मे आ जाना वगैरह वगैरह खैर कुछ दवाएं तो हमेशा चलते रहनी हैं और कुछ दवाएं कुछ समय बाद बंद हो जानी हैं ।
इधर इस दौरान विभा आंटी , डॉ सुनीता जी ,एवं  अंजू मैम मुझे लगातार मेरे साथ होने का एहसास दिलाती रहीं ,हर दिन उनका एक मेसेज ज़रूर मिल रहा है तबीयत कैसी है ,इस अपनेपन को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। ब्लॉग और फेसबुक पर और  भी कई  मित्र मेरे हालचाल लेते रहे हैं  मैं बस यही सोच रहा हूँ कि किस तरह से सबको धन्यवाद कहूँ ? और इस अपनेपन को क्या शब्द  दूँ ?

हाँ एक बात और आज मैंने एक नशेड़ी की तरह इण्स्ट्रूमेंटल सोंग्स सुने हैं और अपने एक और ब्लॉग (http://yashwantrajbalimathur.blogspot.in/) पर वो गाने डाले भी हैं ।आप भी सुनना  चाहें तो देखिएगा ।  फेसबुक मित्र मेरी वॉल को देख लें :)

Thursday, 1 March 2012

निम्नस्तरीय ब्लॉगर

"अरे ये तुमने क्या लिखा है...बहुत ही साधारण और निम्न स्तर का ...ऐसा तो कोई भी लिख सकता है .....तुमने कौन सा तीर मार लिया ?....खामख्वाह के ब्लॉगर बने फिरते हो" ...
 एक दिन सपने मे मुझ से किसी ने कहा ...मगर मेरी भ्रष्ट बुद्धि ने यह सोच कर लिखना जारी रखने का फैसला किया कि मैं कुछ नहीं से कुछ तो हूँ ...कुछ न लिखने से बेहतर मुझे ऐसा ही निम्न स्तर का लिखना (जैसा मैं लिखता हूँ) अच्छा लगता है । 

Monday, 27 February 2012

कुछ फोटो जो मेरे कंप्यूटर के वॉल पेपर बनते रहते हैं










ढीठता .....

कसैला सा
मुंह का स्वाद
टूटता सा बदन
कंप्यूटर स्क्रीन को
घूरती आँखें
चश्मे के भीतर
तीखी चुभती हैं
बुखार के इस
आलम में
झेल रहा हूँ
डांट के तीर
सुन रहा हूँ
 "आराम कर लो "
पर मुझ जैसा ढीठ
हठी और सनकी इंसान
गुनगुना रहा है 
कान पर लगे
हेडफोन मे गूँजते
ब्रायन एडम्स के गाने को
"everything i do ,
do it for you........" 
जैसे नेट के
इस नशे के लिये
मैं बिलकुल ठीक हूँ ?
मैं ऐसा ही हूँ!
 

Wednesday, 15 February 2012

मेरी मर्ज़ी !

सोच रहा हूँ
कुछ लिखूँ
या नहीं लिखूँ
लिखूँ तो क्या लिखूँ
नहीं लिखूँ
तो क्या नहीं लिखूँ
चलो यही लिख देता हूँ कि
मुझे कुछ लिखना है मगर
लिखना चाह कर भी
मैं कुछ लिखना नहीं चाहता
कुछ कहना नहीं चाहता
बस यूं ही


मेरी मर्ज़ी !


Sunday, 12 February 2012

अब यू ट्यूब से सीधे ही अपने मन पसंद फॉर्मेट मे वीडियो डाऊनलोड कीजिये

अगर आप फायर फॉक्स वेब ब्राउज़र इस्तेमाल करते  हैं तो  इस लिंक (Add to firefox) पर क्लिक कर के यह एड ऑन अपने ब्राउज़र मे इन्स्टाल कर लीजिये। इस एड ऑन को इन्स्टाल करने के बाद अपने फायर फॉक्स ब्राउज़र को क्लोज़ करके फिर से ओपन कर लीजिएगा।

अब अगली बार आप जब भी यू ट्यूब पर कोई वीडियो देखेंगे तो नीचे दिये गए चित्र

(बड़ा देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें )

 के अनुसार एक Download link दिखाई देगा जिस पर क्लिक करके आप mp3 सहित 7 तरह के फोरमेट्स मे सीधे साइट से ही डाउन्लोडिंग कर सकते हैं।

यह एड ऑन मैंने इन्स्टाल किया हुआ है। आप भी इस्तेमाल करके देखिये।

Tuesday, 7 February 2012

अपने मोबाइल से मुफ्त में facebook एक्सेस करें

लीजिये चश्मुद्दीन फिर हाजिर है एक और बात करने के लिये । बहुत से लोगों को फेसबुक की ऐसी लत लगी हुई है कि बस पूछिए नहीं। कंप्यूटर से अलग होते ही फेसबुक की गाड़ी मोबाइल पर अपनी रफ्तार मे दौड़ने लगती है। लेकिन फेसबुक उसी मोबाइल पर काम करती है जो GPRS की सुविधा से युक्त हो।मगर अभी   fonetwish नाम की फेसबुक एप्लिकेशन यहाँ तक दावा कर रही है कि रजनीकान्त की वेबसाइट की तरह इस ट्रिक से फेसबुक इस्तेमाल करने के लिये मोबाइल मे इन्टरनेट का होना ही ज़रूरी नहीं है। यानि हर तरह के फोन पर अब आप फेसबुक यूज़ कर सकते हैं। अगर आप Airtel,Videocon,TataDOKOMO (GSM),Loop,Idea या AIRCEL का फोन (सिम) रखते हैं तो आपको पहले फेसबुक पर इस एप्लिकेशन पर अपना नंबर रजिस्टर कराना होगा और उसके बाद अपने मोबाइल से *325# डायल करके इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं।
पता नहीं यह एप्लिकेशन कितनी उपयोगी है क्योंकि मेरे पास टाटा इंडिकोंम और रिलायन्स जीएसएम का फोन है जिसे अभी यह एप्लिकेशन सपोर्ट नहीं कर रही है। अगर आपके मोबाइल पर यह एप्लिकेशन सफलतापूर्वक काम करे तो मुझे भी टिप्पणी दे कर सूचित करें। 
इस एप्लिकेशन के फेसबुक पेज पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें ।  


नोट --यह मेरा नकली ब्लॉग है। असली ब्लॉग पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें 

रोज़ डे पर .....

नोट --यह मेरा नकली ब्लॉग है। असली ब्लॉग पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें  

गुलाब !
तुम्हारे हर पहलू में
बिखरी हुई है
मादक खुशबू
मैं सोचता हूँ
तुम्हें तोड़ूँ नहीं डाली से
तुम यूं ही मुसकुराते रहो
अपनी जड़ों के साथ
सारी बगिया को
गुलज़ार करते हुए
और इसी डाली पर
जब तुम सूख जाओ
तब बन जाना खाद
उसी मिट्टी मे मिल कर
जिसने दी है तुम को
मनमोहिनी सी खुशबू!

Sunday, 5 February 2012

फेसबुक की एक खतरनाक एप्लिकेशन

अब शीर्षक देख कर आप सोचेंगे कि बताओ भला ये भी कोई बात हुई बेचारी फेसबुक पर ऐसी कौन सी एप्लिकेशन आ गयी जिसे ये चश्मुद्दीन खतरनाक कह रहा है ? अब क्या है कि जासूस हर किसी को खतरनाक ही लगता है :D

वैसे जो मेरे फेसबुक मित्र हैं वो ज़रा मुझको अपनी फ्रेंडलिस्ट से बाहर करने मे एक बार सोचलें :) क्योंकि मुझे यहाँ तक पता चल जाएगा कि आपने अपनी प्रोफाइल को डीएक्टिवेट कर लिया है / मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कर दिया है या मुझे अपनी मित्रता सूची से बाहर कर दिया है :)

खैर बिना लाग लपेट के कहूँ तो मैं बात कर रहा हूँ unfriend finder नाम की एक एप्लिकेशन की जो ब्राउज़र आधारित फेसबुक एप्लिकेशन है। इस एप्लिकेशन को अब तक लगभग 1 करोड़ से ज़्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं।

इस फेसबुक एप्लिकेशन की वही सब खासियत हैं जो मैंने आपको गिनाई हैं।

खतरनाक इसलिए कहा क्योंकि मेरे जैसा दिमाग से पैदल इंसान ऐसी बातों को दिल पर नहीं लेता लेकिन सुनने मे आ रहा है कि इस एप्लिकेशन ने बहुत से लोगों मे मनमुटाव भी पैदा कर दिया है।

मैंने तो इस एप्लिकेशन को टेस्ट कर लिया है और अगर आप भी इसे आज़माना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक कर के इस एप्लिकेशन की ओफिशियल साइट पर जा कर अपने ब्राउज़र के हिसाब से इस एप्लिकेशन को सेट कर सकते हैं।

======>>फेसबुकियों के हित में जारी । 


नोट --यह मेरा नकली ब्लॉग है। असली ब्लॉग पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें 

Friday, 27 January 2012

चश्‍में से कैसे हटाएं स्‍क्रैच

 लेख साभार ----http://hindi.boldsky.com/home-garden/improvement/2012/27-01-remove-scratches-from-glasses-aid0204.html

चश्मे पर पड़ने वाले स्क्रेच से मैं बहुत परेशान हूँ। आज अचानक यह लेख दिखा तो यहाँ शेयर कर रहा हूँ।  


 चश्‍में पर स्‍क्रैच पड़ जाने की वजह से अगर आप जल्‍द ही नए चश्‍मों का ऑडर देने की सोंच रहें हैं तो रुक जाइये। यहां पर कुछ टिप्‍स दिए जा रहे हैं जिनसे आप अपने चश्‍में पर पड़े स्‍क्रैच को मिटा सकते हैं। आपको केवल इतना करना है कि किसी भी प्रकार का टेल्‍कम पाउडर लेकर और अपने चश्‍में पर रगड़ दें, इससे जहां भी स्‍क्रैच होगा सामने दिखाई पड़ जाएगा। 

चश्‍में से निशान हटाने के टिप्‍स-

1. घर में आपका टूथपेस्‍ट इस कार्य को आसानी से कर सकता है। एक कपड़े से टूथपेस्‍ट ले कर चश्‍में के स्‍क्रैच वाले स्‍थान पर धीरे धीरे रगडिए और देखिए कि निशान हल्‍का हो चुका होगा। 

2. थोड़ा सा बेकिंग सोड़ा और पानी लेकर पेस्‍ट तैयार करें और उसे स्‍क्रैच वाले स्‍थान पर लगा दें। इससे आपके चश्‍में बिल्‍कुल ब्रैंड न्‍यू लगने लगेगें। 

3. प्‍ला‍स्‍टिक आई रिपेयर के लिए, नारियल का जमा हुआ तेल या फिर मोम काम आ सकता है। इनको लगाने के बाद चश्‍में को कपड़े से पोंछ दीजिए। 

4. आप जिससे अपनी कार के शीशे को साफ करते हैं, यानी की विंडशीट वॉटर रैपेलेंट के दा्रा स्‍क्रैच को साफ कर सकते हैं। इसके अलावा मेटल पॉलिश से भी यह कार्य बड़ी आसानी से किया जा सकता है। 

5. कभी कभी रेफ्रिजरेटर में अपने चश्मे को रखने से और उस पर बर्फ के थक्‍को को हटाने पर भी खरोंच कम हो जाती है। इसको जरुर आजमाएं।

Thursday, 26 January 2012

गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ!

इस ब्लॉग पर देर से ही सही गणतन्त्र दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। 

एक टूटा  सपना  

आज जब मेल पर जयेश कोठारी जी का परिचय देखा तब मुझे याद आया कि सपने किस तरह टूटते हैं। अपना ही एक  ब्लॉग जिसे मैंने लगभग भुला सा दिया है मैंने ये सोच कर बनाया था कि चलो इस तरह ब्लॉग जगत के कुछ विद्वान लोगों के बारे मे जानने को मिलेगा जो सबके लिए हितकर होगा। शायद यह अपनी तरह की अलग पहल थी ,जिसका मैंने तब यथा संभव प्रचार -प्रसार भी किया था। कुछ लोगों ने सराहना भी की थी और विश्वास दिलाया था कि उनके परिचय जल्द ही प्राप्त होंगे लेकिन अफसोस इस पहल पर किसी की निगाह नहीं गयी या बच्चे का बड़बोलापन  समझ कर नज़र अंदाज़ कर दिया होगा। लेकिन इस जैसे कई अन्य ब्लॉग जब उभर कर सामने आ चुके हैं मुझे लगता है कि शायद मैंने एक गलत शुरुआत की थी। मैंने इस ब्लॉग को डिलीट करने का मन बना लिया था तब पापा ने अपना परिचय उस पर डाल कर पीछे न हटने और हार न मानने को कहा। पापा के लिए मजबूरन इस ब्लॉग को मुझे चलाना पड़ रहा है और अब तो 2 लोगों के परिचय आ चुकने के बाद इसे डिलीट करना बेवकूफी ही होगा।   

जो भी हो आज की तारीख मे इसे मैं अपना टूटा हुआ सपना मानता हूँ ये बात और है कि एक अन्य पहल नयी पुरानी हलचल को सबने हाथों हाथ लिया। बहरहाल आज से इस भूले हुए ब्लॉग को अपने ब्लॉग के मीनू बार मे जगह दे रहा हूँ। देखते हैं कितने क्लिक मिलते हैं।

Tuesday, 24 January 2012

ढाई फुट की दूरी

पापा के बहुत कहने पर आज कंप्यूटर के मॉनिटर को खुद से 2.5 फुट दूर किया है। नज़र  कितनी अजीब होती है न ....जब कोई नज़र के बिलकुल पास हो तो कितना अपना सा लगता है और नज़र से दूर होते ही.....? वैसे अभी हम सिर्फ 2.5 फुट दूर हुए हैं और मेरा की बोर्ड हम दोनों के दिलों को जोड़े हुए है। लेकिन लग रहा है जैसे कोई नयी चीज़ सामने हो। वैसे ये दूरी रोहों और चश्मे के बढ़े हुए नंबर का परिणाम है :( जो भी हो बात तो माननी ही थी उद्दंडता की भी एक हद ही होती है। आखिर नज़र की नज़र लग ही गयी और मेरा प्यारा मॉनिटर 2.5 फुट दूर हो गया।
अब करीब न आना मेरी नज़रों के ए दोस्त 
दूर से देखता हूँ तो खूबसूरत लगता है तू । 


Thursday, 19 January 2012

बेमतलब की बात

कुछ बातें बे मतलब की भी होती हैं। ज़रूरी नहीं हम जिससे जो बात करें उसका कोई खास मतलब भी निकले। वैसे मतलबी इंसान हर बात का मतलब निकालता है। चाहे वो सामान्यतः की जाने वाली नमस्ते ही क्यों न हो। एक मित्र ने एक बार एक सेठ जी को नमस्ते कर दी ...सेठ जी ने तपाक से पूछा हाँ भाई कितना चाहिए ?......मित्र ने कहा कि नहीं कुछ नहीं चाहिए अभी तो सेलरी मिली है ज़रूरत पर आप से कहेंगे। अब एक ज़रा सी नमस्ते का इतना एक्स्प्लेनेशन अगर देना पड़े तो कोई किसी से नमस्ते भी नहीं करेगा। इसलिए बेहतर हो यदि बे मतलब की बात का कोई अर्थ न निकाला जाए और उसे बेमत्तलब का ही रहने दिया जाए। 

Tuesday, 10 January 2012

My Favt Song--- "to love again..." (with lyrics)

Enjoy my favt song....with lyrics



To love again...)

drowning in tears that wont be me
I will soon be free from all these chains of all this pain inside
and though I cry it wont be long till I regain the strength to know
I can go on
I will find my way through the heart break I will not give up on love
I believe

*I will learn to love again I will learn to trust
once this heart can mend
I will learn to/Learn to love again

all of these tears time will dry them I will survive them
and make it through into another day all of this pain
time will heal it there’ll be a time sometime I know
I will be feel it
I will live through life without you after the hurting is done
I believe

Chorus

I will find someone who deserves my touch after all the hurt is through
I will be so over you I will not give up on love
I believe yeah

Chorus

Oh yeah yeah oh oh love again

(To love again...)

Monday, 9 January 2012

बेतुका फैसला

अब देखिये न इतनी मेहनत से और इतना पैसा खर्च कर के लखनऊ मे स्मारक बनवाए गए थे और चुनाव आयोग ने झट से इन स्मारकों मे लगी मूर्तियों को ढकने के आदेश दे दिये। वैसे चाहे कुछ होता न होता लेकिन मुझे लगता है असली तमाशा अब शुरू हुआ है क्योंकि  बसपा को  निश्चित तौर पर दलित अफसरों को पद से हटाने और स्मारकों को ढकने के इस बेतुके फैसले  से लाभ ही मिलेगा।  आखिर मिश्रा जी ने कह भी दिया कि ऐसे तो सड़कों मे चलने वाली साइकिल और इंसानी हाथ के पंजे के साथ भी होना चाहिए। स्मारक अपने निर्माण के समय  से ही विवादों मे रहे हैं लेकिन यह कहना कि एक दल विशेष का चुनाव चिह्न होने के कारण इन पर लगी मूर्तियों का असर चुनावों की शुचिता पर असर डालेगा समझ मे न आने वाला फैसला है। यदि इस तर्क को मानें तो किसानों और मजदूरों का अस्त्र माना जाने वाला हंसिया हथोड़ा ,गरीबों का वाहन कही जाने वाली साइकिल ,रोज़ इस्तेमाल मे आने वाली बाल्टी ,हैंडपंप ,इत्यादि पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। संसद परिसर मे लगे हाथी भी इस दायरे मे आने ही चाहिए।

चुनाव आयोग को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।


नोट--यह सिर्फ मेरे अपने विचार हैं।

Saturday, 7 January 2012

एक कोशिश साउंड / वीडियो एडिटिंग की अपनी फोटोस को जोड़ कर।




पूर्वाग्रह !

पूर्वाग्रह !...जब यह शब्द मैंने सब से पहले सुना था तब पापा से पूछा था यह कौन सा ग्रह है। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि शायद यह कोई 10 वां नया ग्रह है ये भी संभवना थी कि पूर्वा नाम की कोई लड़की हो और उसके गृह (घर ) की बात हो रही हो। आखिर कन्फ़्यूजन का फ्यूजन ही कुछ ऐसा होता है जो अक्सर दिमाग का फ्यूज उड़ा देता है। लेकिन जब सिनसियरली नहीं सीरियसली हो कर अपनी क्लास लगवाई तब अपनी रिसर्च इस मुकाम पर पहुंची कि किसी के प्रति मन मे लगने वाला आग्रह नामक ग्रहण पूर्वाग्रह कहलाता है। यह ग्रहण कभी भी लग सकता है इसके लिए पूर्णिमा या अमावस्या का होना ज़रूरी नहीं है। (अब पूर्णिमा या अमावस्या का बायोडाटा नहीं पूछना प्लीज़)

पूर्वाग्रह आग्रह का एक प्रकार भी कहा जा सकता है ठीक उसी प्रकार जैसे आपके ब्लॉग पर टिप्पणी की नीचे मैं अक्सर यह लिख देता हूँ---"जो मेरा मन कहे पर आपका स्वागत है " एक आग्रह ही तो है कि मान्यवर पधारिए अगर आपकी मर्ज़ी हो तो ...लेकिन अगर आप न आएँ तो यह आपकी मर्ज़ी भी हो सकती है और पूर्वाग्रह भी।ठीक इसी प्रकार यदि आप बार बार बुलाएँ और मैं टिप्पणी (अधिकतर अपनी तकिया कलाम टिप्पणी --"बेहतरीन" ) के रूप मे प्रकट न हो सकूँ तो यह मेरा भी पूर्वाग्रह हो सकता है।

खैर यहाँ न बात ब्लोगिंग की हो रही है न टिप्पणी की क्योंकि अगर होने लगी तो आलोचना का ग्रहण लग जाएगा और पूर्वाग्रह विलुप्त हो जाएगा जो मैं नहीं होने देना चाहता।

पूर्वाग्रह सार्वभौमिक है जिसके लिए किसी विशेष प्रकार के देश काल वातावरण की आवश्यकता नहीं है बस आपके मन की आवश्यकता है जो कब कहाँ किस ओर चल दे कहा नहीं जा सकता। एक ऐसा सत्य है जिसे सत्य होते हुए भी हम खुद पर प्रकट रूप मे ज़ाहिर नहीं होने देते क्योंकि हम तो ऐसे हैं भईया ....भीतर से काले...बाहर से गोरे ...लगते हैं बिलकुल कागज से कोरे।(ओरिजनल तुकबंदी है जी ) अब कोई करे भी तो क्या ...जो आपको या मुझको देख कर अच्छा सोचे या बुरा सोचे हर सोच मे इस ग्रह का ग्रहण लगा तो होता ही है । कोई ज़रूरत से ज़्यादा  किसी को अच्छा लगने लगता है ...कोई खराब।  कमबख्त बीच का का कोई हिसाब ही नहीं होता। हो भी नहीं सकता पूर्वाग्रह चीज़ ही ऐसी होती है देखन मे छोटे लगें घाव करें गंभीर।

प्रवचन समाप्त हुए! 

Tuesday, 3 January 2012

मैं वास्तव मे पागल हूँ !

आज जो यह कविता लिख दी है यूं ही नहीं लिख दी है;यह मेरे वास्तविक पागलपन की निशानी है । मुझे याद आते हैं बीते दिन कैलेंडरों और डायरी के लिए पागलपन । डायरी तो शायद ही किसी ने दी हो पर बच्चा मांग रहा है इसलिए केलेण्डर खूब मिल जाते थे। घर के पीछे यानि कमला नगर आगरा  के मेन मार्केट मे चंद्रा बुक डिपो और वैष्णो डेरी वाले की मेरे लखनऊ आ जाने से मुसीबत टली । नहीं तो उन्हें पता था कि यह चश्मे वाला आया तो छोड़ेगा नहीं साल के पहले दिन से जो पीछे पड़ता था कि बस जब तक 10-12 केलेण्डर ना बटोर लूँ छोडता नहीं था।
ऐसा नहीं है कि केलेण्डर के लिए मेरी दीवानगी अब 28 साल के बुढ़ापे मे कम हो गयी है वो अभी भी बरकरार है ...दिल तो अब भी बच्चा है जी...लेकिन यहाँ के दुकानदार सब नए लगते हैं और मैं जाने आने मे थोड़ा रिज़र्व टाइप का हो गया हूँ। इस साल एक भी केलेण्डर के दर्शन नहीं हुए हैं डायरी तो शुरू से ही दूर की कौड़ी रही है। जब बिग बाज़ार मे था तो कई केलेण्डर मिल जाते  थे सप्लायर्स से। खैर मेरे घर से निकलने की देर है....क्योंकि केलेण्डर मिलने मे देर है पर अंधेर नहीं ...मिलेगा ज़रूर मिलेगा...मुझे मेरे चश्मे की कसम है।  :)

Sunday, 1 January 2012

Happy New Year!

उफ़्फ़...
ये बारिश का होना ....
सूरज का छिपे रहना
ठंड का इस कदर बड़ना

सड़क किनारे
थर थर काँपते
फटेहाल नन्हें और बुड्ढे
आसरे और अलाव
की तलाश मे
सुधरे हुए आवारा जानवर

साल का पहला दिन
कितना अजीब सा है
सूर्योदय से सूर्यास्त हो चला
पर दिन
लापता ही रहा :(