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Monday, 9 January 2012

बेतुका फैसला

अब देखिये न इतनी मेहनत से और इतना पैसा खर्च कर के लखनऊ मे स्मारक बनवाए गए थे और चुनाव आयोग ने झट से इन स्मारकों मे लगी मूर्तियों को ढकने के आदेश दे दिये। वैसे चाहे कुछ होता न होता लेकिन मुझे लगता है असली तमाशा अब शुरू हुआ है क्योंकि  बसपा को  निश्चित तौर पर दलित अफसरों को पद से हटाने और स्मारकों को ढकने के इस बेतुके फैसले  से लाभ ही मिलेगा।  आखिर मिश्रा जी ने कह भी दिया कि ऐसे तो सड़कों मे चलने वाली साइकिल और इंसानी हाथ के पंजे के साथ भी होना चाहिए। स्मारक अपने निर्माण के समय  से ही विवादों मे रहे हैं लेकिन यह कहना कि एक दल विशेष का चुनाव चिह्न होने के कारण इन पर लगी मूर्तियों का असर चुनावों की शुचिता पर असर डालेगा समझ मे न आने वाला फैसला है। यदि इस तर्क को मानें तो किसानों और मजदूरों का अस्त्र माना जाने वाला हंसिया हथोड़ा ,गरीबों का वाहन कही जाने वाली साइकिल ,रोज़ इस्तेमाल मे आने वाली बाल्टी ,हैंडपंप ,इत्यादि पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। संसद परिसर मे लगे हाथी भी इस दायरे मे आने ही चाहिए।

चुनाव आयोग को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।


नोट--यह सिर्फ मेरे अपने विचार हैं।

3 comments:

  1. वैसे तो जनता के पैसे से अपने को महिमामंडित करने के लिये इन मूर्तियों को बनवाना ही एक बेतुका फैसला था...

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  2. sach hai ye faisla betuka hi hai, kahan soya tha ye log jab ka paisa yun barbaad kiya ja rha tha, kiya jata rehta hai...

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  3. sach hai ye faisla betuka hi hai, kahan soya tha ye log jab ka paisa yun barbaad kiya ja rha tha, kiya jata rehta hai...

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