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Wednesday, 15 February 2012

मेरी मर्ज़ी !

सोच रहा हूँ
कुछ लिखूँ
या नहीं लिखूँ
लिखूँ तो क्या लिखूँ
नहीं लिखूँ
तो क्या नहीं लिखूँ
चलो यही लिख देता हूँ कि
मुझे कुछ लिखना है मगर
लिखना चाह कर भी
मैं कुछ लिखना नहीं चाहता
कुछ कहना नहीं चाहता
बस यूं ही


मेरी मर्ज़ी !


7 comments:

  1. बस यूँ ही चहलकदमी करते यहाँ तक पँहुच गये थे !

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  2. वाह.. क्या मर्ज़ी है

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  3. ऐसी भी क्या मर्जी , कुछ मर्जी दूसरों की भी ,उनकी कुछ पढने की मर्जी ,

    नही चलेगी आपकी मर्जी , मेरी भी कुछ तो मर्जी.... बहुत हो गई आपकी - दूसरों की मर्जी.....

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  4. aapki marzi men bhi kafi dam hai.......

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  5. ऐसी मनोदशा वाला व्यक्ति ध्यान में आसानी से उतर सकता है।

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  6. meri marzi...man pe marzi nahi chali...dono hi manodasha ke bhaav, sundar likha hai.

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  7. सही है यशवंत जी,,
    आपका ब्लॉग है , अब आपकी ही मर्जी चलेगी..
    पर यह भी अच्छा है :-)

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