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Monday, 27 February 2012

ढीठता .....

कसैला सा
मुंह का स्वाद
टूटता सा बदन
कंप्यूटर स्क्रीन को
घूरती आँखें
चश्मे के भीतर
तीखी चुभती हैं
बुखार के इस
आलम में
झेल रहा हूँ
डांट के तीर
सुन रहा हूँ
 "आराम कर लो "
पर मुझ जैसा ढीठ
हठी और सनकी इंसान
गुनगुना रहा है 
कान पर लगे
हेडफोन मे गूँजते
ब्रायन एडम्स के गाने को
"everything i do ,
do it for you........" 
जैसे नेट के
इस नशे के लिये
मैं बिलकुल ठीक हूँ ?
मैं ऐसा ही हूँ!
 

4 comments:

  1. एकदम सही बात कही है..
    कितनी ही तबियत ख़राब हो ,ya समय नहीं हो...
    पर नेट के लिए सब ठीक हो जाता है..
    हमारा भी कुछ ऐसा ही हल है ...

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  2. यह नशा ही तो इस बीड़े को पूरा करने की ताक़त देता है

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  3. bdhiya likha,aise hi rhiye kya harz hai

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