इस ब्लॉग पर पोस्ट की गयी तस्वीरों (Photographs) पर क्लिक कर के आप उन्हें और स्पष्ट देख सकते हैं।

Friday, 27 December 2013

8 उतना तो कठिन नहीं.....

आज अपने डेस्कटॉप पी सी पर विंडोज़ 8.1 (प्रो) नया नया डाला है। कुछ फीचर्स को छोड़ दें तो विंडोज़ 8 उतना जटिल नहीं लग रहा,जितना इसके बारे मे तमाम तकनीकी समीक्षाओं मे पढ़ने को मिलता रहा है। विंडोज़ 7 और xp की तुलना मे इसकी प्रोसेसिंग तेज है। 8.1 मे स्टार्ट बटन भी उपलब्ध हो गया है। लेकिन स्टार्ट मेन्यू 7 या xp के जैसा नहीं है। 





अगर आपके कंप्यूटर से प्रिन्टर अटेच्ड है तो संभव है कि विंडोज़ 8 के लिए आपको नया ड्राइवर डाऊनलोड करके इन्स्टाल करने की आवश्यकता हो सकती है। जैसे मेरा HP P1007 इसकी सी डी से ही इन्स्टाल हो गया लेकिन HP F2400 series वाले दूसरे प्रिन्टर के लिये ड्राइवर को डाउन्लोड करना पड़ा।
मुझे लगता है कि शुरुआत मे थोड़ी बहुत नाम मात्र की दिक्कत के बाद विंडोज़ 8 किसी को भी बेहतर कार्य अनुभव देने मे सक्षम हो सकता है।

Friday, 6 December 2013

I started a joke

आज नेल्सन मंडेला नहीं रहे। अभी शाम को अचानक ही यह गाना मेरी प्लेलिस्ट मे चलने लगा। सच मे यह गाना बहुत ही Spritual और deep है आप भी सुन लीजिये-

I started a joke, which started the whole world crying,
But I didn't see that the joke was on me, oh no.

I started to cry, which started the whole world laughing,
Oh, if I'd only seen that the joke was on me.

I looked at the skies, running my hands over my eyes,
And I fell out of bed, hurting my head from things that I'd said.

Til I finally died, which started the whole world living,
Oh, if I'd only seen that the joke was on me.

I looked at the skies, running my hands over my eyes,
And I fell out of bed, hurting my head from things that I'd said.

Til I finally died, which started the whole world living,
Oh, if I'd only seen that the joke was one me.

Thursday, 5 December 2013

बहुत दिन हुए बकवास नहीं की ?
जब भी इस ब्लॉग पर आता हूँ देखता हूँ कि सूना सूना सा है। क्या करूँ बातें तो बहुत हैं मेरे पास और रोज़ खुद से ना जाने कितनी ही बातें होती भी हैं लेकिन वो क्या है कि ज़रूरी नहीं कि खुद से होती हर बात को हर बार कुछ शब्द भी दिये जा सकें। इसलिए ब्लॉग का आँगन अक्सर सूना सा ही रहता है :)

Thursday, 21 November 2013

बेहतरीन यू ट्यूब डाउनलोडर .....

यू ट्यूब से वीडियो डाऊनलोड करने के लिये फ़ायरफ़ॉक्स और क्रोम ब्राउज़र के लिए easy youtube downloader एक बेहतर एड ऑन है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि दिये गए चित्र की तरह से यू ट्यूब पर एक डाउनलोड लिंक क्रिएट कर देता है जिसकी सहायता से आप mp 3 फॉर्मेट मे भी गाने/ वीडियो  डाउनलोड कर सकते हैं-


डाउनलोड लिंक(firefox)

download for chrome browser

आधिकारिक वेब साइट का लिंक यह है।

Tuesday, 12 November 2013

आखिर क्या है Team Viewer

कितना अच्छा हो अगर हमारे कंप्यूटर पर कोई समस्या हो और दूर बैठा कोई उसे चुटकियों मे ही हल कर दे। जी हाँ इसी समस्या का बेहतरीन समाधान है team viewer नाम का एक सॉफ्टवेयर। 

वैसे तो इस तरह के कई सॉफ्टवेयर उपलब्ध है लेकिन NON COMMERCIAL उद्देश्य के लिए यह बिलकुल मुफ्त है। इस सॉफ्टवेयर की सहायता से वेब बेस्ड सपोर्ट प्राप्त करने और देने के लिये दोनों ही (जो सपोर्ट देगा और जो सपोर्ट लेगा) कम्प्यूटर्स पर इस सॉफ्टवेयर का इन्स्टाल होना ज़रूरी है। 

इस सॉफ्टवेयर को इन्स्टाल करने के बाद आप जहां सीधे अपने डेस्कटॉप को किसी से भी एकसेस  करवा सकते हैं वहीं अगर आप चाहें तो किसी को सहायता भी दे सकते हैं।

सॉफ्टवेयर को कैसे इस्तेमाल करें-

सब से पहले तो इसे इस लिंक से डाउनलोड कर लीजिये (साइज़ मात्र 6 MB)

सेटअप इन्स्टाल हो जाने के बाद जब आप इस सॉफ्टवेयर को रन कराएंगे तो इस तरह की स्क्रीन दिखेगी-



जैसा कि आप देख रहे हैं इसमे 3 बातें मुख्य हैं। 

1--Your ID--(यह आपकी सॉफ्टवेयर आई डी है,मदद लेते समय आपको यह आई डी मदद देने वाले को बतानी होगी। )

2--Password--(यह 4 अंकों की संख्या है जो मदद लेते समय आपको यह आई डी मदद देने वाले को बतानी होगी।) लेकिन खास बात यह है कि जितनी बार आप इस सॉफ्टवेयर को अपने कंप्यूटर पर open करेंगे उतनी बार यह पासवर्ड अपने आप ही बदल जाएगा। अतः आपको इस बात से निश्चिंत रहना चाहिए कि एक सेशन के बाद वह व्यक्ति जिस को आपने यह ID और Password मदद प्राप्त करने के लिए बताया है आपका कंप्यूटर किसी भी तरह एक्सेस नहीं कर पाएगा। 
आप चाहें तो अपना एक यूनीक पासवर्ड भी सेट कर सकते हैं और उसे हर सेशन के बाद बादल भी सकते हैं। 

3--Control Remote Computer---यह हिस्सा मदद देने के लिए हैं। इसके नीचे दिये गए बॉक्स मे जिस कंप्यूटर को मदद देनी है उसकी ID डालनी होगी और उसके बाद Connect to partner पर क्लिक करते ही Password के लिए एक विंडो  prompt होगी।  जिसे डालते ही आप अपनी मदद देने के लिए दूसरे कंप्यूटर से जुड़ सकते हैं। 

इस सॉफ्टवेयर के बारे मे और अधिक जानकारी  Team Viewer की अधिकृत वेबसाइट से यहाँ क्लिक कर के ली जा सकती है। 

Wednesday, 6 November 2013

2 साल भी हो गए

अभी एक दिन भावना जी ने पूछा कि आखिर मेरे हैं कितने ब्लॉग ,और दूसरे अधिकतर ब्लोगस के कमेंट्स में मेरा कमेन्ट ज़रूर दिखाई देता है :) मेरे अपने कूल 5 ब्लोगस हैं जिनमे से 4 ब्लॉग पर मैं फिलहाल सक्रिय हूँ। नयी पुरानी हलचल,जो मेरा मन कहे,बातें खुद से और music and songs।  इनमे भी इस ब्लॉग यानि बातें खुद से और music and songs पर कभी कभी ही ज़्यादा सक्रिय होता हूँ।

वक़्त बहुत तेज़ी से बढ़ता है...इतना तेजी से कि कुछ पूछिए मत। अब देखिये न  4 नवंबर 2011 को यह ब्लॉग शुरू किया था और देखते देखते 2 साल हो भी गए। खुद से बातें करने का अलग ही मज़ा होता है। बात कहने वाला भी मैं,सुनने वाला भी मैं और अगर हुई तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने वाला भी मैं :) लेकिन कमेन्ट बॉक्स खुला है तो आप लोगों के भी विचार पता चल जाते हैं;अच्छा लगता है।

खैर कभी कभी मन होता है छोटा सा ब्रेक ले ले लूँ पर मैं इतना बड़ा चिपकू हूँ कि आसानी से पीछा कैसे छोड़ दूँ :) :) आप ही बताइये :)

खैर बहुत हो गयी बक बक...अब चलता है हम।

बाय !

Sunday, 3 November 2013

मैं पटाखे नहीं छुड़ाता......

आगरा में रविवार के साप्ताहिक सत्संग के अतिरिक्त आर्यसमाज के प्रवचनों मे पापा के साथ अक्सर जाना होता था खास तौर से होली- दीवाली पर। आर्य समाज कमलानगर मे तब एक सन्यासी जी भी अक्सर अपनी बात रखने आया करते थे स्वामी स्वरूपानन्द जी। बात -व्यवहार से एकदम स्पष्टवादी। किसी को उनका कहा बुरा लगे तो उनकी बला से और गलत बात पर किसी को भरी सभा मे फटकारने से भी उन्हें गुरेज नहीं था। । बचपन से हर दिवाली पर थोड़े बहुत पटाखे चलाने के शौक था। आस-पड़ोस के लोगों को ढेर से पटाखे चलाते देख मेरा भी मन मचलता था। पापा भी दिलवा ही दिया करते थे। पापा ने कभी मना नहीं किया बस इतना ज़रूर था कि पापा ने हमेशा यह ज़रूर कहा कि फालतू चीजों पर खर्च करने से अच्छा उन पैसों से मिठाई या कोई और फल आदि लेना/खा लेना ज़्यादा अच्छा है।

शायद वर्ष  1997-98   की बात है ,तब मैं 9th क्लास में पढ़ता था। उस साल भी दीवाली पर फुलझड़ी आदि लिया हुआ था। लेकिन ऐन दीवाली के दिन स्वामी जी के प्रवचन का ऐसा असर हुआ कि उस दिन से पटाखों से विरक्ति हो गयी। जो थोड़ा बहुत याद है उस अनुसार स्वामी जी ने उक्त प्रवचन मे पटाखों को हिंसात्मक प्रवृत्ति का प्रतीक बताया था जबकि हमारे देश की मूल भावना मे अहिंसा का तत्व अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जैसे तैसे बेमन से उस साल तो फुलझड़ी छुड़ा ही ली थी (क्योंकि बिका हुआ माल दुकानदार वापिस नहीं लेते) पर उसके बाद से आज तक मैंने दीवाली पर कोई पटाखा या फुलझड़ी नहीं खरीदा। पापा आज भी अक्सर कहते हैं कि जिस काम के चीज़ के लिए उन्होने कभी मुझ से मना नहीं किया उस चीज़ की इच्छा मेरे मन से सिर्फ एक प्रवचन को ध्यान से सुन लेने मात्र से ही मिट गयी।

पापा ने इस लिंक पर इस बारे मे खुद भी कुछ लिखा था।

बहुत सी बातें अब भी हैं जिनका मन से मिटना ज़रूरी है।  देखते हैं शायद फिर कहीं कोई ऐसी बात सुनने को मिल ही जाए जिससे बाकी फिजूल की बातों को अस्तित्व भी समाप्त हो सके।

आप सभी को दीप पर्व सपरिवार शुभ और मंगलमय हो। 

Friday, 1 November 2013

GOD बेमेल है.....मैंने गलत तो नहीं कहा न

फिरदौस जी के इस फेसबुक स्टेटस और उस पर अपनी टिप्पणी को सहेजने के लिहाज से इस ब्लॉग पर पोस्ट कर दे रहा हूँ।

काफी लोगों ने अपनी बात काही,मैंने भी कही।
मैं यह नहीं कहता कि जो मैंने कहा वही ठीक है लेकिन जो मैंने कहा वह मुझे लगा कि ठीक ही है।

तो फिलहाल आज की पोस्ट चिप्पियों के नाम :)


जो लोग इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं या देखते ही रहते हैं उन सबको यानि आप सब को धनतेरस की सपरिवार अशेष शुभकामनाएँ!

 


Wednesday, 30 October 2013

हमें अपना उत्साह पहले की ही तरह कायम रखना होगा ।

फेसबुक पर मौजूद तमाम स्टेटस से ज्ञात होता है कि दीपावली की साफ सफाई में काफी लोग जुटे हुए हैं खास तौर से महिलाएं। एक तो घर के ढेर सारे काम उस पर से ये त्योहार....उफ़्फ़ ! लेकिन यह उफ़्फ़ सिर्फ हम ही लोग कर सकते हैं क्योंकि अपना तो काम ही की बोर्ड के खटराग बजाना है। महिलाओं के शब्द कोश मे उफ़्फ़ नाम का या तो कोई शब्द नहीं होता और अगर गलती से होता भी है तो उसका कोई अर्थ नहीं होता।

अगर अपने घर की बात करूँ तो भई हम 3 ही लोग के घर मे कोई खास ज़्यादा मशक्कत वाला काम नहीं है कि कई दिन पहले से जुटना पड़े। बाकी थोड़ी बहुत झाड पोंछ तो होती ही है।

कुछ साल पहले तक दशहरा बीतने के साथ ही दीवाली का बाज़ार सज जाया करता था। उत्साही बच्चे बम -पटाखे फोड़ना शुरू कर देते थे और पूरे अड़ोस-पड़ोस मे एक अलग तरह की हलचल रहती थी। अब तो हर त्योहार की तरह दीवाली भी अपना रंग और तस्वीर बदल रही है। आज अभी तक खील बताशे की इक्का दुकानें ही सजी हैं। संभवतः धनतेरस से बाज़ार अपने रंग मे आएगा हालांकि महंगाई की मार का बुरा असर रौनक पर भी पड़ा है। लगता है जैसे सब कुछ एक औपचारिकता बन कर रह गया है। इस सबके बावजूद सोशल मीडिया और प्रेस के असर से लोग जागरूक भी हो रहे हैं।  पटाखों की घटती बिक्री निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भविष्य का एक बेहतर व सकारात्मक संकेत है।

फिर भी एक बात अक्सर सोचता हूँ कि त्योहारों का जो उत्साह हमारे बीते कल में  था वाह आज नहीं है और जो आज है शायद आने वाले कल मे वाह भी इतिहास हो जाय। अगर नहीं तो हमें अपना उत्साह पहले की ही तरह कायम रखना होगा ।

Saturday, 26 October 2013

आजकल यानी के पीछे पड़ा हूँ

जिन्हें नहीं पता वो सोचेंगे आखिर मैं कौन यानी के पीछे पड़ा हूँ तो मैं बता दूँ की यानी (Yanni) एक पश्चिम के बहुत बड़े संगीतकार हैं।

पिछली पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए यह भी कहूँगा कि जब मैं कोई गाना (हिन्दी या अङ्ग्रेज़ी) या इन्स्टृमेंटल म्यूज़िक सुनता हूँ और अगर वह मुझे बहुत पसंद आ जाता है तो बस उसे ही सुनता रहता हूँ जब तक मन न भर जाए। कई बार तो ऐसा होता है एक ही गाना पूरे दिन सुनता रहता हूँ।  फिलहाल काफी दिन से ऐसा कुछ यानी के साथ हो रहा है। बहुत बुरी तरह से पीछे पड़ गया हूँ उनके। यानी को मैं तब से जानता हूँ जब 1997 में उनका अब तक का एकलौता कॉन्सर्ट आगरा मे हुआ था। हालांकि ताजमहल के पीछे होने वाले उस कार्यक्रम मे मैं प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं था लेकिन16 साल बाद यानी इसी साल 2013 में मुझे वह कॉन्सर्ट यूट्यूब पर देखने को मिल गया। और उसके बाद समझिए यानी जी की शामत ही आ गयी क्योंकि ethnicity,keys to imagination,if i could tell you, और out of silence जैसे एल्बम्स को मैंने डाऊनलोड कर लिया है। जब तब सुनता ही रहता हूँ और इस पोस्ट को लिखते हुए भी सुन रहा हूँ।

एक बात और मुझे लाइव कॉन्सर्ट देखने का भी बहुत शौक है। bee gees  के भी कई लाइव कॉन्सर्ट मैंने डाउन्लोड किए हुए हैं :) और उसका कारण है ऑर्केस्ट्रा।  ऑर्केस्ट्रा मे बजते तरह तरह म्यूजिकल इन्स्ट्रुमेंट जी तरह से परफ़ोर्म करते हैं,उनको बजाने वालों के जो हाव भाव होते हैं वह हमेशा से मुझे आकर्षित करते हैं। कभी मेरी भी तमन्ना थी कि पियानो या गिटार बजाना सीखूँ लेकिन अब औरों को बजाते देख कर सुकून महसूस करता हूँ।

फिलहाल मुझे बस इतना कहना है  कि आप भी बच के रहिएगा जैसे आज यानी के पीछे पड़ा हूँ ,हो सकता है कल आपकी ही किसी ब्लॉग पोस्ट के पीछे पड़ जाऊँ :D

आखिर कुछ भी हो सकता है न :)।

गुड बाय!

Monday, 21 October 2013

म्यूज़िक मेरा नशा

मेरे लगभग सभी दोस्त जानते हैं कि मैं म्यूज़िक का बहुत बड़ा शौकीन हूँ। आप कुछ भी कहें लेकिन मुझे लगता है मेरी पसंद कुछ अजीब तरह की है। अगर मुझे इंडियन म्यूज़िक सुनना होता है तो मैं बहुत पुराने गाने सुनना पसंद करता हूँ। के एल सहगल जी ,मुकेश जी ,रफी साहब ,किशोर दा,हेमंत दा आशा जी और लता जी के गानों की बात ही और है। खास तौर से आशा जी और किशोर दा के गाने .....जब सुनने लगता हूँ तो समय कब बीतता है पता नहीं चलता।

लेकिन 1990 के बाद की भारतीय फिल्मों के गाने मुझे इक्का दुक्का ही पसंद हैं। एक तो आज कल के गाने कभी कभी लगता है कि कॉपी पेस्ट हैं। सिन्थेसाइजर की वजह से सभी की धुन एक जैसी ही लगती है बस बीट्स और इन्स्ट्रूमेंट्स बदले से लगते हैं। इससे बेहतर तो एनरिक इग्लेसियस को सुनना लगता है। वैसे सच कहूँ तो ओल्ड इज़ गोल्ड का मुहावरा किसी ने  यूं ही नही गड़ा होगा। अङ्ग्रेज़ी गानों मे भी जो मज़ा BEE GESS और KENNY ROGERS को सुनने मे है वह मज़ा एनरिक या माईली सारस को सुनने में नहीं आता। लेकिन उस सबके बावजूद विदेशी संगीत मे मौलिकता ही झलकती है। पता नहीं क्यों हमारे बॉलीवुड के नकलची संगीतकार लोग तकनीक के साथ तकनीक को मौलिकता के साथ प्रयोग करना नहीं सीखते या सीखना नहीं चाहते।   

Tuesday, 15 October 2013

सपने...स्कूल के दिन और यादें

कुछ यादें ऐसी होती हैं जो हमारे स्मृति पटल पर कहीं हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं और रह रह कर हमें अपने आवरण से ढक लेती हैं।  इस आवरण के भीतर कभी कभी कभी हम ऐसे खोते हैं कि उससे बाहर आने का मन ही नहीं करता। मेरे स्कूली दिनों की यादें भी ऐसी ही हैं। लगता है जैसे कल ही स्कूल छोड़ा हो। वैसे भी जीवन मे कुल 3 ही स्कूल देखे मैंने। और लोगों की तरह पापा ने हर साल-दो साल पर मेरा स्कूल नहीं बदला। श्री एम एम  शैरी स्कूल कमला नगर आगरा,श्री राधा बल्लभ इंटर कॉलेज दयाल बाग आगरा,और राजा बलवंत सिंह महा विद्यालय बस यही 3 स्कू, रहे मेरे। इसमे भी सबसे ज़्यादा समय एम एम शैरी स्कूल मे बीता। नर्सरी से कक्षा 10 तक की पढ़ाई वहीं की। तो याद वहीं की सबसे ज़्यादा आती है। और आज कल तो हद हो गयी है, रोज़ सपने में किसी क्लास मे खुद को पाता हूँ। नींद के आगोश मे खोना यानि स्कूल के दिन का शुरू होना। आँख बंद करते ही अपने स्कूल के मैदान मे प्रार्थना करना...हम को मन की शक्ति देना ,फिर जन गण मन,उसके बाद पीटी और फिर क्लास मे जाना। क्लास मे अपनी बेंच पर बैठना, साथियों से लड़ना,मैडम की डांट  खाना ,क्लास रूम रीडिंग मे हिन्दी और संस्कृत के पाठ को तेज़ी से शुद्धता के साथ पढ़ना और तारीफ पाना,अङ्ग्रेज़ी और गणित की क्लास मे घबराया हुआ रहना (क्या दिन थे वो भी) ,इंटरवल और फिर जब स्कूल की छुट्टी कि घंटी बजती है तो क्लास से बाहर भागते ही नींद टूट जाती है,सपनों के बाहर दिन निकल चुका होता है और सुबह के 6-7 बज रहे होते हैं। सपने के इस स्कूल की  खास बात यह है कि होम वर्क नहीं मिलता। ऐसे सपने देख कर बिस्तर से उठने का मन नहीं करता। जी करता है स्कूल की वह ड्रेस फिर से पहन लूँ और पहुँच जाऊँ अपने बचपन की किसी क्लास में। शायद इसीलिए हर सुबह घर के सामने से गुजरते स्कूली बच्चों को देख कर मेरा मन भी उन्हीं का हाथ थाम कर पूछने को होता है मुझ से दोस्ती करोगे ?

Friday, 12 July 2013

जी मेल inbox का नया रूप

जी मेल inbox का नया रूप मुझे तो बहुत अच्छा लगा।

इस तरह के स्मार्ट मेल बॉक्स के आने से ज़रूरी ई मेल्स की छंटनी बहुत आसान हो गयी है।

जी मेल का नया इन बॉक्स Primary,Social,promotions,updates और forums इन 5 टैब्स मे बांटा गया है।(बिलकुल उसी तरह जैसे वेबसाइट्स पर मुख्य पृष्ठ आदि टैब्स दिये रहते हैं)

जिसमे primary वाले टैब के अंदर व्यक्तिगत मेल्स,social वाले टैब्स मे ब्लॉग पोस्ट के कमेंट्स से संबन्धित मेल्स,गूगल+,फेसबुक और इन जैसे सोशल नेटवर्क्स से आने वाले मेल नोटिफिकेशन्स शामिल रहेंगे। promotions के अंतर्गत अलग अलग साइट्स से आने वाले विज्ञापन, updates मे सोशल अपडेट्स,और forums के अंतर्गत आपके द्वारा जॉइन किए गए याहू,फेसबुक या अन्य ग्रुप्स के मेल नोटिफिकेशन्स वर्गीकृत रहेंगे।

आप अपनी सुविधानुसार drag & drop विधि से आने वाली मेल्स के लिए सही टैब का चुनाव कर सकते हैं।

शुरुआत मे हो सकता है कि यहा नया इनबॉक्स कुछ असुविधाजनक लगे लेकिन कुल मिलाकर अब ज़रूरी मेल्स के इगनोर होने की संभावना कम से कम तो हो ही गयी है।

यदि यह नया मेल बॉक्स आपकी जी मेल मे स्वतः एक्टिव नहीं हुआ है तो इसे एक्टिवेट करने के लिये निम्न लिंक पर बताए गए स्टेप्स को फॉलो करें-

http://www.gottabemobile.com/2013/06/04/how-to-get-the-new-gmail-inbox-now/

पसंद न आने पर इसे डिसेबल करने के लिये टैब्स को un select करने मात्र की आवश्यकता रहेगी


यह भी देखें--

Monday, 22 April 2013

अपने ब्लॉग पर लगाएँ गूगल + कमेन्ट सिस्टम

लीजिये आज कर रहा हूँ मैं थोड़ा काम की बकवास। वैसे खुद से बातें करना मुझे बहुत अच्छा लगता है और खुद से बतियाते हुए शैतान दिमाग बहुत कुछ देखता और करता भी रहता है।





यूं तो अभी दो एक दिन पहले ही गूगल ने blogspot users (मतलब  जिनके ब्लॉग blo spot पर हैं) के लिए एक नया कमेन्ट सिस्टम लॉन्च किया है जो मेरी अक्लानुसार फेसबुक के कमेन्ट सिस्टम को एक ज़बरदस्त चुनौती है। क्योंकि फेसबुक का कमेन्ट सिस्टम लगाने के लिए ब्लॉग के html मे माथापच्ची करनी पड़ती है जबकि गूगल + का कमेन्ट सिस्टम सिर्फ एक क्लिक मे इन्स्टाल हो जाता है।

तो आइये देखते हैं कि किस तरह आप इस कमेन्ट सिस्टम को अपने ब्लॉग पर लगा सकते हैं।

गूगल+ कमेन्ट सिस्टम लगाने से पहले की तैयारी-

1- अपनी  ब्लॉग प्रोफाइल को गूगल+प्रोफाइल में बदल लें।

इस चित्र की सहायता ले कर connect to google + पर क्लिक करने के बाद आगे के स्टेप्स फॉलो करें। (aacept terms and conditions पर ज़रूर क्लिक कर दीजिएगा। )आपकी ब्लॉग प्रोफाइल गूगल + प्रोफाइल पर शिफ्ट हो जाएगी।



(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )

2-यदि आपकी ब्लॉग प्रोफाइल पहले ही गूगल + पर है तो इस प्रक्रिया को करने की आवश्यकता नहीं है। 


Step 1

गूगल + कमेन्ट सिस्टम लगाने के के लिए निम्न चित्र की तरह डैश बोर्ड मे अपने ब्लॉग को सलेक्ट कर के google + पर क्लिक करें-


(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )
 
 Step-2

Step 1 के बाद आप एक नए पेज पर redirect (मतलब एक नया वेब पेज खुल जाएगा) हो जाएंगे जिसके दूसरे ऑप्शन ( ? ) के सामने वाले बॉक्स को निम्न चित्र  की तरह चेक कर दीजिये।



(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )

 बस इतना करते ही google + कमेन्ट बॉक्स आपके ब्लॉग पर सेट हो जाएगा।


इस कमेन्ट बॉक्स के फायदे 

1-अपने ब्लॉग मित्रों के साथ ही आप google + के अपने सभी circles से कनेक्ट रह सकते हैं।
2-यह आपकी सभी ब्लॉग पोस्ट्स पर पहले आई टिप्पणियों को  सिंक (जो टिप्पणिया आ चुकी हैं उन्हें भी दिखाएगा) कर लेगा।
3-यदि आपने गूगल + पर अपनी पोस्ट को शेयर (send mail option के साथ) तो मेल  पर प्राप्त हुए कमेंट्स भी आपके ब्लॉग के कमेन्ट बॉक्स में दिखेंगे।
4-कमेंट्स का रिप्लाई करना आसान है और + बटन दबा कर आप कमेंट्स को Like कर सकते हैं।
5-बेनामी कमेंट्स के आने की कोई संभावना नहीं क्योंकि इस कमेन्ट सिस्टम मे वैध गूगल प्रोफाइल का होना आवश्यक है।
6-कमेन्ट देने वाला अपने कमेन्ट को एडिट कर सकता है। 

इस कमेन्ट बॉक्स के नुकसान   

1- अगर आपने कभी यह कमेन्ट बॉक्स हटाने (सिर्फ बॉक्स को uncheck करना होगा) का मूड बनाया तो आए हुए सभी कमेंट्स ब्लॉग से गायब हो जाएंगे। 
2- अन्य किसी भी आई डी से आप कमेन्ट नहीं कर सकते गूगल पर आपकी आई डी होना ज़रूरी है। 

गूगल को सुझाव

1-यदि नुकसान का पहला वाला पहला पॉइंट सुधार दें और
2-I P address ट्रैकिंग की सुविधा (मतलब कमेन्ट देने वाले का I P address भी डिस्प्ले हो) हो तो सोने पे सुहागा होगा। 



निष्कर्ष:-गूगल का बेहतरीन उपहार सभी ब्लोगर्स के लिए। आजमा कर देखिये। 

Tuesday, 9 April 2013

शेल्फ साहित्य

बहुत दिन बाद आज फिर इस ब्लॉग पर बैठा हूँ अपनी बकने के लिये। वैसे बकता तो मैं JMK पर रोज़ ही हूँ पर इस ब्लॉग को बनाया था थोड़ी अलग तरह की बक बक  करने के लिए।

आज कल फेसबुक पर देखता हूँ कि हर रोज़ कोई न कोई मित्र किसी न किसी किताब या संग्रह के कवर पृष्ठ मे टैग किया जाता है वह इसलिए कि उस तथाकथित संग्रह में उनकी रचना शामिल होती है। गलती से मेरी दिली असहमति के बावजूद किसी के कहने पर मुझे भी एक संग्रह में शामिल होना पड़ा था और एक संग्रह का सम्पादन भी करना पड़ा था। जिस संग्रह में मेरी बकवास पंक्तियाँ ( उन्हें 'कविता' नाम देना 'कविता' की बेइज्जती करना होगा इसलिए पंक्तियाँ कहूँगा) प्रकाशित हुई उसमे प्रकाशन के लिए मैंने एक रुपया भी नहीं दिया था , जिसका सम्पादन किया उसके लिए ऊंट के मुंह मे जीरा और कवर पर नाम छपा मिला। लेकिन इससे पर्दे के पीछे छिपी सच्चाई जानी और सीखने समझने को भी बहुत कुछ मिला।

दरअसल छपास एक ऐसा रोग है जो हर किसी को होता ही है ,मेरे को भी है और मैं अपना नाम अपने ब्लॉग पर देख कर खुश हो लेता हूँ या किसी अखबार मे कहीं छप गया तो भी थोड़ी खुशी तो हो ही जाती है। लेकिन किसी संग्रह में खुद का लिखा  छपवाना वह भी 5 से 10 हज़ार तक देकर और उसके बाद उस संग्रह की कुछ प्रतियाँ पाने के लिए 500-1000 डाक खर्च देना और बाद में उसे शेल्फ मे सजा देना कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है।

बड़ी शान से लोग अपनी उपलब्धि बघारते हैं और वह भी सच को छुपा कर। ऐसे संग्रहों मे जो भी कुछ छपता है,जिसका भी छपता है वह सिर्फ अपने लिए अपना ही होता है और मुनाफा उसे होता है जिसकी जेब मे पैसा जाता है। आखिर जिस किताब/ किताबों  को एक बार निहार कर (पढ़ कर नहीं क्योंकि अपुन ने जो लिखा उसे अपुन पढ़ तो चुका ही है) शेल्फ में सजा दिया जाय तो वह शेल्फ साहित्य ही हुआ न।

बस नाम की खातिर लोग पैसा खर्च कर रहे हैं,शेल्फ मे सज रहे है। खैर अपने को क्या आज नहीं तो कल अक्ल पर पड़े पत्थर उसी तरह हटेंगे जैसे मेरी अक्ल पर पड़े पत्थरों में से अब कुछ गायब हो चुके हैं।


~यशवन्त माथुर

Wednesday, 20 February 2013

यशवन्त उवाच-

अभी कुछ दिन से टाईपिंग का थोड़ा काम आया हुआ है। जब्तशुदा कहानियाँ (वह कहानियाँ जिन्हें तत्कालीन अङ्ग्रेज़ी सरकार से प्रकाशित नहीं होने दिया था और अपने कब्जे मे ले लिया था) टाइप की हैं जिनमें 2-3 प्रेम चंद की हैं और बाकी अन्य लेखकों की।सच कहूँ तो इन कहानियों की आज भी प्रासंगिकता है। सबका एक ही निष्कर्ष है कि फांसी या मृत्यु दंड नहीं होना चाहिए। अभी 2 दिन पहले के अखबार मे पढ़ रहा था कि दुनिया के करीब 140 देशों मे मृयुदण्ड की सजा अब नहीं दी जाती है और आज के अखबार मे सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के हवाले से छपा है कि उम्र कैद का मतलब 14- से 20 वर्ष जेल मे रहना ही नहीं है बल्कि सारी उम्र जेल मे रह कर सजा काटने से है। हाँ 14-20 साल की सजा के बाद सक्षम न्यायालय दोषी की सजा माफ करने पर विचार कर सकता है। सो मेरे हिसाब से सजा उम्र कैद की सजा ही रहनी चाहिये और कुछ अपवादों के साथ मृत्युदंड को भारत जैसे देश मे भी समाप्त कर ही देना चाहिये।
वैसे भी मेरा मानना है कि मृत्यु दंड की सजा देनी ही है तो भी फांसी के अलावा कुछ पश्चिमी देशों की तरह इंजेक्शन आदि दे कर भी इस सजा पर अमल किया जा सकता है। खैर यह एक व्यापक बहस का मुद्दा है। पक्ष और विपक्ष सबके अपने विचार हो सकते हैं।