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Wednesday, 20 February 2013

यशवन्त उवाच-

अभी कुछ दिन से टाईपिंग का थोड़ा काम आया हुआ है। जब्तशुदा कहानियाँ (वह कहानियाँ जिन्हें तत्कालीन अङ्ग्रेज़ी सरकार से प्रकाशित नहीं होने दिया था और अपने कब्जे मे ले लिया था) टाइप की हैं जिनमें 2-3 प्रेम चंद की हैं और बाकी अन्य लेखकों की।सच कहूँ तो इन कहानियों की आज भी प्रासंगिकता है। सबका एक ही निष्कर्ष है कि फांसी या मृत्यु दंड नहीं होना चाहिए। अभी 2 दिन पहले के अखबार मे पढ़ रहा था कि दुनिया के करीब 140 देशों मे मृयुदण्ड की सजा अब नहीं दी जाती है और आज के अखबार मे सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के हवाले से छपा है कि उम्र कैद का मतलब 14- से 20 वर्ष जेल मे रहना ही नहीं है बल्कि सारी उम्र जेल मे रह कर सजा काटने से है। हाँ 14-20 साल की सजा के बाद सक्षम न्यायालय दोषी की सजा माफ करने पर विचार कर सकता है। सो मेरे हिसाब से सजा उम्र कैद की सजा ही रहनी चाहिये और कुछ अपवादों के साथ मृत्युदंड को भारत जैसे देश मे भी समाप्त कर ही देना चाहिये।
वैसे भी मेरा मानना है कि मृत्यु दंड की सजा देनी ही है तो भी फांसी के अलावा कुछ पश्चिमी देशों की तरह इंजेक्शन आदि दे कर भी इस सजा पर अमल किया जा सकता है। खैर यह एक व्यापक बहस का मुद्दा है। पक्ष और विपक्ष सबके अपने विचार हो सकते हैं।

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