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Monday, 22 April 2013

अपने ब्लॉग पर लगाएँ गूगल + कमेन्ट सिस्टम

लीजिये आज कर रहा हूँ मैं थोड़ा काम की बकवास। वैसे खुद से बातें करना मुझे बहुत अच्छा लगता है और खुद से बतियाते हुए शैतान दिमाग बहुत कुछ देखता और करता भी रहता है।





यूं तो अभी दो एक दिन पहले ही गूगल ने blogspot users (मतलब  जिनके ब्लॉग blo spot पर हैं) के लिए एक नया कमेन्ट सिस्टम लॉन्च किया है जो मेरी अक्लानुसार फेसबुक के कमेन्ट सिस्टम को एक ज़बरदस्त चुनौती है। क्योंकि फेसबुक का कमेन्ट सिस्टम लगाने के लिए ब्लॉग के html मे माथापच्ची करनी पड़ती है जबकि गूगल + का कमेन्ट सिस्टम सिर्फ एक क्लिक मे इन्स्टाल हो जाता है।

तो आइये देखते हैं कि किस तरह आप इस कमेन्ट सिस्टम को अपने ब्लॉग पर लगा सकते हैं।

गूगल+ कमेन्ट सिस्टम लगाने से पहले की तैयारी-

1- अपनी  ब्लॉग प्रोफाइल को गूगल+प्रोफाइल में बदल लें।

इस चित्र की सहायता ले कर connect to google + पर क्लिक करने के बाद आगे के स्टेप्स फॉलो करें। (aacept terms and conditions पर ज़रूर क्लिक कर दीजिएगा। )आपकी ब्लॉग प्रोफाइल गूगल + प्रोफाइल पर शिफ्ट हो जाएगी।



(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )

2-यदि आपकी ब्लॉग प्रोफाइल पहले ही गूगल + पर है तो इस प्रक्रिया को करने की आवश्यकता नहीं है। 


Step 1

गूगल + कमेन्ट सिस्टम लगाने के के लिए निम्न चित्र की तरह डैश बोर्ड मे अपने ब्लॉग को सलेक्ट कर के google + पर क्लिक करें-


(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )
 
 Step-2

Step 1 के बाद आप एक नए पेज पर redirect (मतलब एक नया वेब पेज खुल जाएगा) हो जाएंगे जिसके दूसरे ऑप्शन ( ? ) के सामने वाले बॉक्स को निम्न चित्र  की तरह चेक कर दीजिये।



(और स्पष्ट देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें )

 बस इतना करते ही google + कमेन्ट बॉक्स आपके ब्लॉग पर सेट हो जाएगा।


इस कमेन्ट बॉक्स के फायदे 

1-अपने ब्लॉग मित्रों के साथ ही आप google + के अपने सभी circles से कनेक्ट रह सकते हैं।
2-यह आपकी सभी ब्लॉग पोस्ट्स पर पहले आई टिप्पणियों को  सिंक (जो टिप्पणिया आ चुकी हैं उन्हें भी दिखाएगा) कर लेगा।
3-यदि आपने गूगल + पर अपनी पोस्ट को शेयर (send mail option के साथ) तो मेल  पर प्राप्त हुए कमेंट्स भी आपके ब्लॉग के कमेन्ट बॉक्स में दिखेंगे।
4-कमेंट्स का रिप्लाई करना आसान है और + बटन दबा कर आप कमेंट्स को Like कर सकते हैं।
5-बेनामी कमेंट्स के आने की कोई संभावना नहीं क्योंकि इस कमेन्ट सिस्टम मे वैध गूगल प्रोफाइल का होना आवश्यक है।
6-कमेन्ट देने वाला अपने कमेन्ट को एडिट कर सकता है। 

इस कमेन्ट बॉक्स के नुकसान   

1- अगर आपने कभी यह कमेन्ट बॉक्स हटाने (सिर्फ बॉक्स को uncheck करना होगा) का मूड बनाया तो आए हुए सभी कमेंट्स ब्लॉग से गायब हो जाएंगे। 
2- अन्य किसी भी आई डी से आप कमेन्ट नहीं कर सकते गूगल पर आपकी आई डी होना ज़रूरी है। 

गूगल को सुझाव

1-यदि नुकसान का पहला वाला पहला पॉइंट सुधार दें और
2-I P address ट्रैकिंग की सुविधा (मतलब कमेन्ट देने वाले का I P address भी डिस्प्ले हो) हो तो सोने पे सुहागा होगा। 



निष्कर्ष:-गूगल का बेहतरीन उपहार सभी ब्लोगर्स के लिए। आजमा कर देखिये। 

Tuesday, 9 April 2013

शेल्फ साहित्य

बहुत दिन बाद आज फिर इस ब्लॉग पर बैठा हूँ अपनी बकने के लिये। वैसे बकता तो मैं JMK पर रोज़ ही हूँ पर इस ब्लॉग को बनाया था थोड़ी अलग तरह की बक बक  करने के लिए।

आज कल फेसबुक पर देखता हूँ कि हर रोज़ कोई न कोई मित्र किसी न किसी किताब या संग्रह के कवर पृष्ठ मे टैग किया जाता है वह इसलिए कि उस तथाकथित संग्रह में उनकी रचना शामिल होती है। गलती से मेरी दिली असहमति के बावजूद किसी के कहने पर मुझे भी एक संग्रह में शामिल होना पड़ा था और एक संग्रह का सम्पादन भी करना पड़ा था। जिस संग्रह में मेरी बकवास पंक्तियाँ ( उन्हें 'कविता' नाम देना 'कविता' की बेइज्जती करना होगा इसलिए पंक्तियाँ कहूँगा) प्रकाशित हुई उसमे प्रकाशन के लिए मैंने एक रुपया भी नहीं दिया था , जिसका सम्पादन किया उसके लिए ऊंट के मुंह मे जीरा और कवर पर नाम छपा मिला। लेकिन इससे पर्दे के पीछे छिपी सच्चाई जानी और सीखने समझने को भी बहुत कुछ मिला।

दरअसल छपास एक ऐसा रोग है जो हर किसी को होता ही है ,मेरे को भी है और मैं अपना नाम अपने ब्लॉग पर देख कर खुश हो लेता हूँ या किसी अखबार मे कहीं छप गया तो भी थोड़ी खुशी तो हो ही जाती है। लेकिन किसी संग्रह में खुद का लिखा  छपवाना वह भी 5 से 10 हज़ार तक देकर और उसके बाद उस संग्रह की कुछ प्रतियाँ पाने के लिए 500-1000 डाक खर्च देना और बाद में उसे शेल्फ मे सजा देना कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है।

बड़ी शान से लोग अपनी उपलब्धि बघारते हैं और वह भी सच को छुपा कर। ऐसे संग्रहों मे जो भी कुछ छपता है,जिसका भी छपता है वह सिर्फ अपने लिए अपना ही होता है और मुनाफा उसे होता है जिसकी जेब मे पैसा जाता है। आखिर जिस किताब/ किताबों  को एक बार निहार कर (पढ़ कर नहीं क्योंकि अपुन ने जो लिखा उसे अपुन पढ़ तो चुका ही है) शेल्फ में सजा दिया जाय तो वह शेल्फ साहित्य ही हुआ न।

बस नाम की खातिर लोग पैसा खर्च कर रहे हैं,शेल्फ मे सज रहे है। खैर अपने को क्या आज नहीं तो कल अक्ल पर पड़े पत्थर उसी तरह हटेंगे जैसे मेरी अक्ल पर पड़े पत्थरों में से अब कुछ गायब हो चुके हैं।


~यशवन्त माथुर