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Tuesday, 9 April 2013

शेल्फ साहित्य

बहुत दिन बाद आज फिर इस ब्लॉग पर बैठा हूँ अपनी बकने के लिये। वैसे बकता तो मैं JMK पर रोज़ ही हूँ पर इस ब्लॉग को बनाया था थोड़ी अलग तरह की बक बक  करने के लिए।

आज कल फेसबुक पर देखता हूँ कि हर रोज़ कोई न कोई मित्र किसी न किसी किताब या संग्रह के कवर पृष्ठ मे टैग किया जाता है वह इसलिए कि उस तथाकथित संग्रह में उनकी रचना शामिल होती है। गलती से मेरी दिली असहमति के बावजूद किसी के कहने पर मुझे भी एक संग्रह में शामिल होना पड़ा था और एक संग्रह का सम्पादन भी करना पड़ा था। जिस संग्रह में मेरी बकवास पंक्तियाँ ( उन्हें 'कविता' नाम देना 'कविता' की बेइज्जती करना होगा इसलिए पंक्तियाँ कहूँगा) प्रकाशित हुई उसमे प्रकाशन के लिए मैंने एक रुपया भी नहीं दिया था , जिसका सम्पादन किया उसके लिए ऊंट के मुंह मे जीरा और कवर पर नाम छपा मिला। लेकिन इससे पर्दे के पीछे छिपी सच्चाई जानी और सीखने समझने को भी बहुत कुछ मिला।

दरअसल छपास एक ऐसा रोग है जो हर किसी को होता ही है ,मेरे को भी है और मैं अपना नाम अपने ब्लॉग पर देख कर खुश हो लेता हूँ या किसी अखबार मे कहीं छप गया तो भी थोड़ी खुशी तो हो ही जाती है। लेकिन किसी संग्रह में खुद का लिखा  छपवाना वह भी 5 से 10 हज़ार तक देकर और उसके बाद उस संग्रह की कुछ प्रतियाँ पाने के लिए 500-1000 डाक खर्च देना और बाद में उसे शेल्फ मे सजा देना कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है।

बड़ी शान से लोग अपनी उपलब्धि बघारते हैं और वह भी सच को छुपा कर। ऐसे संग्रहों मे जो भी कुछ छपता है,जिसका भी छपता है वह सिर्फ अपने लिए अपना ही होता है और मुनाफा उसे होता है जिसकी जेब मे पैसा जाता है। आखिर जिस किताब/ किताबों  को एक बार निहार कर (पढ़ कर नहीं क्योंकि अपुन ने जो लिखा उसे अपुन पढ़ तो चुका ही है) शेल्फ में सजा दिया जाय तो वह शेल्फ साहित्य ही हुआ न।

बस नाम की खातिर लोग पैसा खर्च कर रहे हैं,शेल्फ मे सज रहे है। खैर अपने को क्या आज नहीं तो कल अक्ल पर पड़े पत्थर उसी तरह हटेंगे जैसे मेरी अक्ल पर पड़े पत्थरों में से अब कुछ गायब हो चुके हैं।


~यशवन्त माथुर

4 comments:

  1. बीती ताहि बीसार दे आगे की सुध लेय
    बीती ताहि बीसार के ,ले आगे के सुध !!
    शुभकामनायें !!

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  2. बीती ताहि बीसार दे आगे की सुध लेय
    बीती ताहि बीसार के ,ले आगे के सुध !!
    शुभकामनायें !!

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  3. यशवंत जी क्या बात खूब लिखा. एक और तरीका बताता हूँ छपास मिटाने का .ब्लॉग की सारी कवितायेँ प्रिंट करो और उसे किताब के रूप में बाँध लो और सेल्फ में सजा लो , हां उसमे प्रकाशक , मूल्य, कब छपी सब कुछ और सेल्फ में साजाओ .. देख देख खुश होओ....

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  4. बहुत बहुत धन्यवाद कुश्वंश सर!
    आपने जो यहाँ टिप्पणी लिखा है वैसा ही कुछ मैं इस लिंक पर कह चुका हूँ। कभी समय मिले तो देखिएगा--
    http://jomeramankahe.blogspot.in/2013/03/blog-post_5643.html



    सादर

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