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Monday, 21 October 2013

म्यूज़िक मेरा नशा

मेरे लगभग सभी दोस्त जानते हैं कि मैं म्यूज़िक का बहुत बड़ा शौकीन हूँ। आप कुछ भी कहें लेकिन मुझे लगता है मेरी पसंद कुछ अजीब तरह की है। अगर मुझे इंडियन म्यूज़िक सुनना होता है तो मैं बहुत पुराने गाने सुनना पसंद करता हूँ। के एल सहगल जी ,मुकेश जी ,रफी साहब ,किशोर दा,हेमंत दा आशा जी और लता जी के गानों की बात ही और है। खास तौर से आशा जी और किशोर दा के गाने .....जब सुनने लगता हूँ तो समय कब बीतता है पता नहीं चलता।

लेकिन 1990 के बाद की भारतीय फिल्मों के गाने मुझे इक्का दुक्का ही पसंद हैं। एक तो आज कल के गाने कभी कभी लगता है कि कॉपी पेस्ट हैं। सिन्थेसाइजर की वजह से सभी की धुन एक जैसी ही लगती है बस बीट्स और इन्स्ट्रूमेंट्स बदले से लगते हैं। इससे बेहतर तो एनरिक इग्लेसियस को सुनना लगता है। वैसे सच कहूँ तो ओल्ड इज़ गोल्ड का मुहावरा किसी ने  यूं ही नही गड़ा होगा। अङ्ग्रेज़ी गानों मे भी जो मज़ा BEE GESS और KENNY ROGERS को सुनने मे है वह मज़ा एनरिक या माईली सारस को सुनने में नहीं आता। लेकिन उस सबके बावजूद विदेशी संगीत मे मौलिकता ही झलकती है। पता नहीं क्यों हमारे बॉलीवुड के नकलची संगीतकार लोग तकनीक के साथ तकनीक को मौलिकता के साथ प्रयोग करना नहीं सीखते या सीखना नहीं चाहते।   

1 comment:

  1. सही बात है...कुछ संगीतकारों से ये शिकायत तो है.. पर अब भी कई ऐसे हैं जो निराश नहीं करते। आपकी पसंद अच्छी है।

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