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Sunday, 3 November 2013

मैं पटाखे नहीं छुड़ाता......

आगरा में रविवार के साप्ताहिक सत्संग के अतिरिक्त आर्यसमाज के प्रवचनों मे पापा के साथ अक्सर जाना होता था खास तौर से होली- दीवाली पर। आर्य समाज कमलानगर मे तब एक सन्यासी जी भी अक्सर अपनी बात रखने आया करते थे स्वामी स्वरूपानन्द जी। बात -व्यवहार से एकदम स्पष्टवादी। किसी को उनका कहा बुरा लगे तो उनकी बला से और गलत बात पर किसी को भरी सभा मे फटकारने से भी उन्हें गुरेज नहीं था। । बचपन से हर दिवाली पर थोड़े बहुत पटाखे चलाने के शौक था। आस-पड़ोस के लोगों को ढेर से पटाखे चलाते देख मेरा भी मन मचलता था। पापा भी दिलवा ही दिया करते थे। पापा ने कभी मना नहीं किया बस इतना ज़रूर था कि पापा ने हमेशा यह ज़रूर कहा कि फालतू चीजों पर खर्च करने से अच्छा उन पैसों से मिठाई या कोई और फल आदि लेना/खा लेना ज़्यादा अच्छा है।

शायद वर्ष  1997-98   की बात है ,तब मैं 9th क्लास में पढ़ता था। उस साल भी दीवाली पर फुलझड़ी आदि लिया हुआ था। लेकिन ऐन दीवाली के दिन स्वामी जी के प्रवचन का ऐसा असर हुआ कि उस दिन से पटाखों से विरक्ति हो गयी। जो थोड़ा बहुत याद है उस अनुसार स्वामी जी ने उक्त प्रवचन मे पटाखों को हिंसात्मक प्रवृत्ति का प्रतीक बताया था जबकि हमारे देश की मूल भावना मे अहिंसा का तत्व अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जैसे तैसे बेमन से उस साल तो फुलझड़ी छुड़ा ही ली थी (क्योंकि बिका हुआ माल दुकानदार वापिस नहीं लेते) पर उसके बाद से आज तक मैंने दीवाली पर कोई पटाखा या फुलझड़ी नहीं खरीदा। पापा आज भी अक्सर कहते हैं कि जिस काम के चीज़ के लिए उन्होने कभी मुझ से मना नहीं किया उस चीज़ की इच्छा मेरे मन से सिर्फ एक प्रवचन को ध्यान से सुन लेने मात्र से ही मिट गयी।

पापा ने इस लिंक पर इस बारे मे खुद भी कुछ लिखा था।

बहुत सी बातें अब भी हैं जिनका मन से मिटना ज़रूरी है।  देखते हैं शायद फिर कहीं कोई ऐसी बात सुनने को मिल ही जाए जिससे बाकी फिजूल की बातों को अस्तित्व भी समाप्त हो सके।

आप सभी को दीप पर्व सपरिवार शुभ और मंगलमय हो। 

3 comments:

  1. सार्थक चिंतन है ...
    दीपावली के पावन पर्व की बधाई ओर शुभकामनायें ...

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  2. बहुत सुंदर !!आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामना !!

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  3. सुन्दर विचार

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